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चीते हुए गैस्ट्रिक बीमारी के शिकार !

चीते हुए गैस्ट्रिक बीमारी के शिकार !

Apr 9, 2015

इंसानों की कैद में चीतों को आम तौर पर पैकेज्ड मांस खाने को मिलता है, जिसके चलते उनमें गैस्ट्रिक समस्या बढ़ रही है. उत्तर अमरीका में क़ैद में रखे गए चीतों में 95 फ़ीसदी और यूरोप में 55 फ़ीसदी चीते गैस्ट्रिक समस्या से पीड़ित हैं. गैस्ट्रिक समस्या यानी जो खाया जाए, वो पचता नहीं है, उल्टी हो जाती है या दस्त लग जाता है और तेजी से उनका वजन भी कम होता है. वहीं दूसरी ओर जंगलों में स्वतंत्र रहने वाले चीतों में गैस्ट्रिक समस्या नहीं के बराबर देखी गई है. ये माना जा रहा है कि भोजन के तौर पर कच्चे मांस और कंकाल खाना जंगली जानवरों में गैस्ट्रिक से बचाव में मददगार साबित होता है. दरअसल ये सब अपनी तरह के इकलौते सर्वेक्षण से जाहिर हुआ है. इसमें 19 देशों के करीब 184 चीतों के स्वास्थ्य और खानपान पर नज़र रखी गई है. चीतों की यह संख्या दुनिया भर में कैद रखे गए चीतों में 12 फ़ीसदी है.

अपनी तरह का अध्ययन

इससे संबंधित अध्ययन पीएलओएस वन जर्नल में प्रकाशित हुआ है. इसके मुताबिक जिन चीतों को पैकेज्ड मांस (घोड़े या फिर बीफ़) विटामिन और मिनरल के साथ दिया जाता है, उनमें ये समस्या होने की आशंका ज्यादा होती है.

शोध दल में शामिल और नाटिंघम ट्रेंट यूनिवर्सिटी के स्कूल ऑफ़ एनिमल, रुरल और इनवायरनमेंटल साइंसेज़ की फेलो कैथरीन वाइटहाउस टेड कहती हैं, “क़ैद में रखे गए चीतों में गैस्ट्रिक की चपेट में आने का ख़तरा बढ़ गया है. इस समस्या का हल हमें तलाशना होगा.” कैथरीन आगे कहती हैं, “व्यवसायिक तौर पर पैकेज्ड मांस ही गैस्ट्रिक समस्या का कारण है, ये हम साबित नहीं कर पाए हैं. लेकिन हमने पाया कि कच्चे मांस और लंबी हड्डियों और पसलियों के खाने से इस समस्या से बचाव होता है.” दुनिया भर के वन्य जीव केंद्रों से एक ऑनलाइन सर्वे के ज़रिए चीते के खान-पान के बारे में पूछा गया था. इसके जवाब में मिले आंकड़ों के मुताबिक 37 फ़ीसदी चीते कच्चा मांस खाते हैं जबकि 20 फ़ीसदी चीतों को व्यवसायिक तौर पर तैयार मांस खाने को मिलता है जबकि आठ फ़ीसदी चीतों को कंकाल खाने को मिलता है.

सेंसेटिव होते हैं चीते

इसमें ये भी देखा गया कि व्यवसायिक तौर पर तैयार किए गए मांस का इस्तेमाल उत्तरी अमरीका में होता है और इसी इलाके के चीते गैस्ट्रिक से सबसे ज़्यादा प्रभावित हैं.शोध करने वाले दल का कहना है कि इस दिशा में अभी गंभीर अध्ययन की जरूरत है, ताकि इसका पता चल सके कि चीतों में गैस्ट्रिक होने की कोई अन्य वजहें तो नहीं है.

हालांकि इस अध्ययन से इस बात के संकेत जरूर मिले हैं कि घोड़े के पैकेज्ड मांस खाने से चीतों में गैस्ट्रिक का ख़तरा बढ़ता है और मादा चीतों के इसके चपेट में आने की आशंका नर चीते से ज़्यादा होती है. चीता पृथ्वी का सबसे तेज़ भागने वाला जीव है जो अधिकतम 114 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ़्तार से दौड़ सकता है और इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजर्वेशन ऑफ़ नेचर की ओर संरक्षित जीवों की सूची में शामिल है. जंगली चीतों की सबसे बड़ी आबादी में नामीबिया में निवास करती है. भारत में दशकों पहले चीता लुप्त हो चुका है. डॉ. वाइटहाउस टेड चीतों पर बीते 15 साल से काम कर रही हैं. उनका कहना है, “चीतों के गैस्ट्रिक संबंधी बीमारियों के चपेट में आने की आशंका ज़्यादा है, जो बताता है कि वे कहीं ज़्यादा संवेदनशील होते हैं.”

 

As posted in http://www.bbc.co.uk

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