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भारत में लौटे बाघ

भारत में लौटे बाघ

Feb 1, 2014

भारत में विलुप्त होने की कगार पर पहुंचे बाघों की संख्या पिछले दो साल में बढ़ी है. खतरे में पड़े इस खूबसूरत जानवर को नई जगह बसाने का फायदा हो रहा है.

बाघों के संरक्षण पर दुनिया की नजर भारत पर टिकी हुई थी क्योंकि दुनिया के आधे बाघ भारत में रहते हैं. यहां के 41 वन्य जीव अभयारण्यों और राष्ट्रीय उद्यानों में अंदाजन 3,200 बाघ रहते हैं. पिछले दशक के शुरुआती दौर में इन जीवों के अंधाधुंध अवैध शिकार के कारण वन्य जीव अधिकारी चिंतित थे. 2005 में भारत के नेशनल टाइगर कंजरवेशन अथॉरिटी ने फैसला किया कि इन्हें बचाने के लिए सघन कोशिशें की जाएंगी.

2004 में राजस्थान के सरिस्का नेशनल पार्क में अवैध शिकार के कारण बाघ खत्म होने की कगार पर आ गए थे. लेकिन 2008 में शुरू हुए ट्रांसलोकेशन कार्यक्रम के कारण अब सरिस्का में 10 बाघ हैं जिनमें दो शावक और पांच मादा बाघ हैं. इन्हें पास के रणथंबौर से लाया गया था.

सरिस्का टाइगर फाउंडेशन के दिनेश दुर्रानी ने डॉयचे वेले को बताया, ” हमें यह प्रयोग पहले ही कर लेना चाहिए था.” 2012 में भारत में 80 से ज्यादा बाघ मारे गए जिनमें से ज्यादातर अवैध शिकार के कारण थे. यह दशक का सबसे ज्यादा था. इनमें से अधिकतर शिकार महाराष्ट्र और कर्नाटक में हुए.

Flash-Galerie Tiger (Indien)

दोहरी कोशिश

सरिस्का टाइगर फाउंडेशन की कोशिशों से प्रेरित होकर मध्य प्रदेश की सरकार ने भी कुछ बाघ पन्ना रिजर्व में पहुंचाए हैं. वन्य जीव संरक्षण के लिए काम करने वाले कौस्तुभ शर्मा ने बताया, “दो जगहें जहां बाघ के ट्रांसलोकेशन का कार्यक्रम सफल हुआ है वह हैं, पन्ना और सरिस्का. अब पन्ना में करीब 28 बाघ हैं.”

शर्मा पन्ना में बाघों को रेडियो कॉलरिंग लगाने के काम में शामिल हैं. उन्होंने बताया कि अगर बाघों को सही सुरक्षा और शिकार की जगहें मिलें तो उनमें प्रजनन बढ़ सकता है. बाघों और शेरों के अवैध शिकार को अधिकारियों ने किसी तरह कम किया और इसी कारण बाघों की संख्या लगातार बढ़ रही है. नतीजा यह है कि बिहार में भी बाघों की संख्या पिछले तीन साल में दुगनी हो गई है.

नए तरीके

विशेषज्ञों का मानना है कि बाघों की संख्या बढ़ने के बावजूद संतुष्ट नहीं हुआ जा सकता क्योंकि शिकारी भी शिकार के नए नए तरीके ढूंढ रहे हैं. अब चीन ऐसी जगह बन गया है जहां बाघों के शरीर के अलग अलग हिस्से या हड्डियां अवैध तरीके से खरीदी जा सकती हैं. पारंपरिक चीनी दवाई के लिए इनका इस्तेमाल किया जाता है.

बाघ की हड्डियां एक हजार डॉलर प्रति सौ ग्राम की कीमत में मिलती हैं जबकि बाघ की खाल की कीमत 11 से 12 हजार डॉलर तक हो सकती है. वाइल्डलाइफ प्रोटेक्शन सोसाइटी की बेलिंडा राइट इस पर तेज कार्रवाई की मांग करती हैं. वह कहती हैं,” भारत ने इस मुद्दे पर चीन से सवाल नहीं किया है. इस पर सभी अंतरराष्ट्रीय फोरमों में बहस की जानी चाहिए.”

टाइगर रिजर्व

2012 जुलाई में भारतीय सुप्रीम कोर्ट ने पर्यटकों को टाइगर रिजर्व में बहुत अंदर तक जाने के लिए मना कर दिया था ताकि अवैध शिकार पर रोक लग सके. लेकिन यह प्रतिबंध हटा लिया गया और सभी राज्यों से व्यापक बाघ संरक्षण योजनाएं तैयार करने के लिए कहा गया.

बाघों के रहने की जगहों में शिकार का पर्याप्त मात्रा में होना, बाघों के लिए पर्याप्त जगह और पानी होना संरक्षण के लिए अहम है. वहीं दूसरी और टाइगर रिजर्व के आस पास कई जगहों पर गांव हैं. ऐसी स्थिति में कई बार वहां के निवासी बाघ का शिकार बन जाते हैं. दुर्रानी ने बताया,”रेडियो कॉलरों के कारण बाघों की हलचल और घूमने का क्षेत्र देखा जा सकता है. अब हम बता सकते हैं कि बाघ किसी इंसानी बस्ती में तो नहीं घुस रहा. इस अभियान के कारण इंसान और बाघों के बीच टकराव खत्म हो सकेगा.”

As posted in dw.de

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