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टाइगर टेंपल: यहां बौद्ध भिक्षुओं के साथ रहते हैं बाघ

टाइगर टेंपल: यहां बौद्ध भिक्षुओं के साथ रहते हैं बाघ

Feb 24, 2015

थाईलैंड का ‘टाइगर टेंपल’ एक ऐसा मंदिर है, जहां बौद्ध भिक्षुओं के साथ बड़ी संख्या में बाघ भी रहते हैं। कंचनबुरी प्रांत के साईंयोक जिले में स्थित यह बौद्ध मंदिर दुनिया का एकमात्र ‘टाइगर टेंपल’ है, जो लोकप्रियता की पराकाष्ठा पर होने के साथ विवादों में भी रहा है। जंगली जानवरों के लिए वन्य मंदिर या अभयारण्य के रूप में 1994 में इसकी स्थापना की गई थी और 1999 में यहां बाघ का पहला बच्चा लाया गया था। यह बाघों के साथ-साथ गाय, भैंस, बकरियों, घोड़े, भालू, शेर, मोर, हिरणों की पांच प्रजातियों का भी निवास स्थल है, लेकिन इस मंदिर के आकर्षण का केंद्र केवल बाघ ही हैं। इन बाघों की नस्लों के बारे में हालांकि कोई सटीक जानकारी नहीं है, लेकिन अनुमान है कि यहां पाए जाने वाले बाघों में इंडोचाइनीज, बंगाल टाइगर और मलेशियाई टाइगर शामिल हैं।

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यहां बाघ के लाए जाने का भी रोचक किस्सा है। वर्ष 1999 में शिकारियों के डर से बाघ के बच्चे को मंदिर में लाया गया था। क्योंकि बाघ की मां पहले ही शिकारियों का निशाना बन चुकी थी। हालांकि बाघ का यह बच्चा ज्यादा दिनों तक जीवित नहीं रह सका। इस घटना के बाद से यहां शुरू हुआ बाघ शावकों को पालने का सिलसिला आज भी जारी है। आज यह मंदिर देश-विदेश से आए लाखों पयर्टकों के आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। हर साल भारी तादाद में सैलानी यहां आकर इन बाघों को करीब से देखने और इनके साथ फोटो खिंचवाने के लिए ललायित रहते हैं। इन बाघों को बचपन से ही मनुष्यों के साथ घुलने-मिलने के उद्देश्य के साथ प्रशिक्षण दिया जाता है। थाईलैंड का नाम विश्व के प्रमुख पयर्टक देशों की सूची में शामिल है और टाइगर टेंपल की वजह से थाईलैंड में पर्यटकों की संख्या में लगातार इजाफा हो रहा है। पिछले दो सालों से भारतीय पर्यटकों की संख्या भी यहां काफी बढ़ी है और इसकी वजह वैश्विक स्तर पर टाइगर टेंपल की बढ़ती लोकप्रियता है। यहां आने वाले पर्यटकों की सुरक्षा के लिए कड़े दिशानिर्देश भी जारी किए गए हैं। पयर्टकों को यहां लाल रंग के वस्त्र पहनकर आने पर पाबंदी है। मंदिर परिसर में शोर मचाना और भागदौड़ करना भी वर्जित है। यहां तक कि महिलाओं के छोटे कपड़े पहनकर आने पर भी प्रतिबंध है। इस मंदिर को दुनिया का सबसे विवादस्पद मंदिर भी कहा जाता है। मंदिर के बारे में कई नकारात्मक पहलू भी सामने आए हैं। मंदिर पर बाघों की तस्करी और इनके उत्पीड़न के आरोप भी लगते रहे हैं। यह भी आरोप लगता रहा है कि इन बाघों को पालतू बनाए रखने के लिए उन्हें नशीले पदार्थों का सेवन कराया जाता है। ‘केयर फॉर द वाइल्ड इंटरनेशनल’ संस्था ने 2005 से 2008 के बीच इकट्ठा की गई सूचनाओं के आधार पर दावा किया है कि मंदिर प्रबंधन लाओस में टाइगर फार्म के साथ अवैध रूप से बाघों का लेन-देन करता है।2007 से लेकर अब तक बाघों के 21 से अधिक शावकों ने यहां जन्म लिया और 2011 से लेकर अब तक यहां बाघों की संख्या बढ़ कर 90 से अधिक हो गई है। टाइगर टेंपल की ओर रुख कर रहे पयर्टक यहां बड़ी मात्रा में धनराशि भी खर्च कर रहे हैं। इस मंदिर में प्रवेश शुल्क 400 थाई बहात यानी लगभग 750 रुपए है, जबकि विदेशी सैलानियों को बाघों के साथ अपनी विशेष तस्वीर खिंचवाने के लिए अधिक धनराशि भी खर्च करनी पड़ सकती है। मंदिर प्रबंधकों के मुताबिक पर्यटकों से एकत्रित की गई धनराशि का इस्तेमाल बाघों के रखरखाव और ‘टाइगर आईलैंड’ के निर्माण पर खर्च किया जाता है। ‘टाइगर आईलैंड’ के निर्माण के बाद वहां बाघों को स्थानांतरित करने की योजना है।

 

 

 

As posted in Hindi.news18.com

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