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‘बिवाईं की पीर’ में बाघों का जंगल से बाहर भी विचरण, पीलीभीत टाइगर रिज़र्व के आस-पास दिखा बाघ

‘बिवाईं की पीर’ में बाघों का जंगल से बाहर भी विचरण, पीलीभीत टाइगर रिज़र्व के आस-पास दिखा बाघ

Dec 26, 2015

पीलीभीत : कहावत है जाके पांव न फटी बिवाईं, सो का जाने क्या पीर पराई..। बिवाईं की पीड़ा तो जंगल के राजा शेर के अलावा बाघों को भी सताती है। यही कारण है कि इन दिनों सर्दियों में बाघों का विचरण न केवल बफर जोन में खूब हो रहा है बल्कि सीमांत खेतों में भी विचरण करते दिखाई पड़ जाते हैं। ऐसी स्थिति में बाघों के साथ किसानों की भी सुरक्षा के लिए टाइगर रिजर्व प्रशासन ने बफर जोन व सीमांत इलाकों में चौकसी बढ़ा दी है।

बाघों के बारे में माना जाता है कि सर्दियों में शिकार के चक्कर में वे गन्ने के खेतों में अपना ठिकाना बनाने लगते हैं, जिससे कई बार किसानों को खतरे से जूझना पड़ता है। गन्ना खाने के लिए जंगली सुअर व अन्य कुछ वन्य जीव खेतों की ओर आते रहते हैं और पहले से मौजूद बाघ को आसानी से शिकार मिल जाता है। टाइगर रिजर्व प्रशासन के मुताबिक सर्दी के दिनों में बाघ के पैर में बिवाईं फटती हैं, जिसके कारण घास पर चलने में उन्हें दिक्कत होती है। ऐसी स्थिति में जंगल की साफ-सुथरी पगडंडियों पर विचरण करना पसंद करते हैं और इन्हीं रास्तों से चलकर बफर जोन या फिर खेतों की ओर भी पहुंच जाते हैं। यह भी सही है कि इन दिनों आसान शिकार के चक्कर में भी गन्ने के खेतों में पहुंच जाते हैं।

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पीलीभीत टाइगर रिजर्व के 73 हजार हेक्टेयर कोर एरिया के अलावा करीब चार हजार हेक्टेयर बफर एरिया भी है जो पगडंडियों के जरिए कोर एरिया से जुड़ा है। इसके अलावा जिले के करीब 275 गांव जंगल से लगे हुए हैं। सीमांत गांवों के खेतों में कई बार बाघ विचरण करते पहुंच जाते हैं। मैनाकोट, मलपुर, हरदासपुर, पड़री, महोफ, जमुनिया, टाह पौटा जैसे गांवों के खेतों में लगातार बाघ देखे गए हैं। टाइगर रिजर्व प्रशासन की ओर से सीमांत गांवों में समय-समय पर अभियान चलाकर लोगों को जागरूक भी किया जाता है, जिससे जहां ग्रामीणों की वजह से न तो वन्यजीवों को कोई नुकसान पहुंचे और न ही वन्य जीवों के कारण ग्रामीण असुरक्षित हों।

आधा घंटे तक टहलता रहा बाघ

मंगलवार को चूका बैरियर से सेमल कुआं तक करीब आधे घंटे तक जंगली पगडंडी के रास्ते बाघ विचरण करता रहा। महोफ के रेंजर केपी सिंह के मुताबिक बाघ उस वक्त दिखा, जब टाइगर रिजर्व स्टाफ गश्त पर था। वह पगडंडी के रास्ते करीब आधे घंटे तक चलता रहा। पीछे-पीछे स्टाफ के लोग भी उस पर नजर लगाए थे कि कहीं वह खेतों की ओर तो नहीं जा रहा है। करीब आधे घंटे में सेमल कुआं के पास पहुंचने के बाद बाघ कोर एरिया में चला गया। इन दिनों स्टाफ को भी निर्देश दिए गए हैं कि वे बफर एरिया व सीमांत इलाकों पर नजर रखें और अगर इस एरिया में कहीं बाघ की आमदरफ्त दिखे तो तुरंत सूचित करें।

सर्दियों में बाघों के पैरों में बिवाईं फटती है, जिसके कारण वे साफ सुथरे रास्ते पर चलना पसंद करते हैं। ऐसे में जंगल के पगडंडियों से चलकर बफर जोन या फिर सीमांत खेतों तक भी पहुंच जाते हैं। गन्ने के खेतों में भी जंगली सुअर व चीतल जैसे शिकार के चक्कर में बाघ पहुंच जाते हैं। ऐसे में किसानों को चाहिए कि वे अकेले खेत की ओर न जाएं। जब भी खेत की ओर जाना हो तो लाठी-डंडे लेकर ही समूह में जाएं। हो-हल्ला मचाते हुए जाएं। अगर गन्ना काटना हो पहले खेत की बाहरी ओर से हो-हल्ला मचाएं ताकि यदि बाघ या कोई अन्य कोई वन्य जीव यदि गन्ने में हो तो जंगल में चला जाए। यह भी गौरतलब है कि प्राय: बाघ तब तक हमला नहीं करता, जब तक वह खुद खतरा न महसूस करे। ऐसे में यह भी ध्यान रखने की जरूरत होती है कि अपनी ओर से कोई ऐसी गलती न हो जिससे बाघ हमलावर हो जाए।

-कैलाश प्रकाश, डीएफओ टाइगर रिजर्व

 

 

 

 

As posted in Jagran.com

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