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संकट में नदियों का अस्तित्व

संकट में नदियों का अस्तित्व

Mar 20, 2014

हमारी जीवनदायिनी नदियां खुद अपने अस्तित्व के लिए जूझ रही हैं.

तमाम शोधों-अध्ययनों के खुलासे के बाद भी हम उन्हें बचाने के लिए कुछ नहीं कर रहे उल्टे उन्हें और गंदा करते चले जा रहे हैं. नतीजन आज नदियों का जल आचमन लायक तक नहीं है. कमोबेश पूरे देश की नदियों का यही हाल है. आज नदियों के अस्तित्व के साथ उनके उद्गम से ही खिलवाड़ हो रहा है. केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड का कहना है कि देशभर के 900 से अधिक शहरों और कस्बों का 70 फीसद गंदा पानी पेयजल की प्रमुख स्रेत नदियों में बिना शोधन के छोड़ दिया जाता है. नदियों को प्रदूषित करने में दिनों दिन बढ़ते उद्योग प्रमुख भूमिका निभा रहे हैं. प्रदूषण की मार झेलती देश की 70 फीसद नदियां मरने के कगार पर हैं. इनमें गुजरात की अमलाखेड़ी, साबरमती और खारी, हरियाणा की मारकंदा, मध्य प्रदेश की खान, उत्तर प्रदेश की काली और हिंडन, आंध्र की मुंसी, दिल्ली में यमुना और महाराष्ट्र की भीमा मिलाकर 10 नदियां सबसे ज्यादा प्रदूषित हैं. कहीं ये गर्मी का मौसम आते-आते दम तोड़ देती हैं तो कहीं नाले का रूप धारण कर लेती हैं. इनका पानी किसी भी रूप में पीने लायक नहीं रहता है. नदी जल हो या भूजल, जंगल हो या पहाड़, तमाम प्राकृतिक उपादानों का दोहन तो हमने भरपूर किया, उनसे लिया तो बेहिसाब लेकिन भूल गए कि हमारा कुछ वापस देने का दायित्व भी है. नदियों से लेते समय हम भूल गए कि जिस दिन वे देने लायक नहीं रहेंगी, उस दिन क्या होगा? आज वह समय आ गया लगता है. गंगा, यमुना, नर्मदा, ताप्ती, गोदावरी, कृष्णा, कावेरी, महानदी, ब्रह्मपुत्र, सतलुज, रावी, व्यास, झेलम या चिनाव हों या फिर इनकी सहायक नदियां, किसी को भी प्रदूषण मुक्त नहीं कहा जा सकता है. प्राकृतिक संसाधनों के दोहन का सबसे ज्यादा खमियाजा नदियों को ही तो भुगतना पड़ा है. गंगा-यमुना को तो हमने इस सीमा तक प्रदूषित कर डाला है कि दोनों को प्रदूषण मुक्त करने के लिए अब तक करीब 15 अरब रुपये खर्च किए जा चुके हैं, फिर भी उनकी हालत 20 साल पहले से बदतर है. राष्ट्रीय नदी गंगा की बात करें तो कन्नौज, कानपुर, इलाहाबाद, वाराणसी और पटना सहित कई जगहों पर उसका जल आचमन लायक भी नहीं रह गया है. यदि धार्मिक भावना के वशीभूत उसमें डुबकी लगा ली तो त्वचा रोग का शिकार हुए बिना नहीं रहेंगे. कानपुर से आगे का जल पित्ताशय के कैंसर और आंत्रशोध का सबब बन गया है. गंगा जल का खास कभी खराब न होने वाला गुण भी अब खत्म होता जा रहा है. गंगा में रोजाना 8,250 मिलियन लीटर सीवेज का पानी और 1.528 बिलियन क्यूबिक मीटर औद्योगिक कचरा जो उड़ेला जा रहा है. यह स्थिति उसके उद्गम स्थल देवप्रयाग से पहले भागीरथी और अलकनंदा के शुरुआती नगरों-कस्बों से लेकर आखिर तक जारी है. दिल्ली के 56 फीसद लोगों की जीवनदायिनी यमुना यहां जिन लोगों को जीवन दे रही है, वे ही उसमें मलमूत्र, उद्योगों का कचरा, जहरीले रसायन व धार्मिक अनुष्ठान का कचरा आदि उड़ेल उसका अस्तित्व मिटाने पर तुले हैं. अपने 1376 किमी लम्बे रास्ते में मिलने वाली कुल गंदगी का अकेले 2 फीसद यानी 22 किमी के रास्ते में मिलने वाली 79 फीसद दिल्ली की गंदगी ही यमुना को जहरीला बनाने के लिए काफी है. यमुना की सफाई को लेकर कई परियोजनाएं बन चुकी हैं. उसे ‘टेम्स’ बनाने का नारा भी लगाया गया है. लेकिन परिणाम ढाक के तीन पात रहे हैं. यमुना आज गंदे नाले में बदल चुकी है. यमुना के निर्मलीकरण के नाम पर बीते डेढ़ दशक में 1800 करोड़ रुपये खर्च हो चुके हैं लेकिन हालात पहले से  बदतर होते जा रहे हैं. कारण यमुना में 650 एमजीडी गंदा पानी रोजाना गिर रहा है और 1557 छोटे और 18 बड़े गंदे नाले उसे और गंदा कर रहे हैं.  यमुना को सबसे ज्यादा गंदा नजफगढ़ नाला कर रहा है जिसमें  38 शहरी और गांव-देहात के 3 मिलाकर कुल 41 गंदे नाले आकर गिरते हैं.

पीलीभीत के गोमद ताल, माधवटांडा से लेकर बनारस से पहले कैथीधार में गंगा से मिलने वाली गोमती नदी अपने लगभग 325 किलोमीटर लम्बे मार्ग में कहीं भी शुद्ध नहीं है. अपने उद्गम से लेकर सीतापुर, हरदोई, लखनऊ, बहराइच और जौनपुर-बनारस तक के पूरे रास्ते में यह घूमते हुए कैथीधार पहुंचती है. इसलिए इसे घूमती नदी भी कहते हैं. लखनऊ में इस नदी में बिना ट्रीटमेंट के 25 से ज्यादा नालों और दर्जनों कारखानों का औद्योगिक कचरा डाला जा रहा है. इसके 12 किमी के दायरे में कुल मिलाकर 33 करोड़ लीटर गंदे पानी के साथ1800 टन घरेलू कचरा रोज गोमती में गिर रहा है. घरेलू कचरा नदी के पाटों पर जमा रहता है. ब्रह्मपुत्र के प्रदूषण में गुवाहाटी के तेल शोधक कारखाने के औद्योगिक कचरे की भूमिका अहम रही है. नर्मदा को लें, अमरकंटक से शुरू होकर विंध्य और सतपुड़ा की पहाड़ियों से गुजरकर अरब सागर में मिलने तक कुल 1,289 किमी की यात्रा में इसका अथाह दोहन हुआ है. 1980 के बाद इसकी बदहाली के गंभीर परिणाम सामने आये. अब तो नर्मदा में अक्सर मरे हुए सड़े-गले जानवरों के शव तैरते मिल जाते हैं. बड़वा के औद्योगिक प्रतिष्ठानों का रसायन युक्त विषाक्त कचरा चोरल नदी के माध्यम से नर्मदा में मिलकर उसे और प्रदूषित कर रहा है. यही दुर्दशा बैतूल जिले के मुलताई से निकलकर सूरत तक जाने वाली व आखिर में अरब सागर में मिलने वाली सूर्य पुत्री ताप्ती की है जो आज दम तोड़ने के कगार पर है. तमसा बहुत पहले विलुप्त हो गई थी. बेतवा की कई सहायक नदियों की छोटी-बड़ी जल धाराएं भी सूख गई हैं. देश की प्रदूषित हो चुकी नदियों को साफ करने का अभियान लगभग 25 वर्षों से चल रहा है. इस पर अरबों रुपये खर्च हो चुके हैं, लेकिन हालात बदतर होते जा रहे हैं. हालात की भयावहता का अंदाजा इसी से लग सकता है कि आज नदियां मलमूत्र विसर्जन का माध्यम और जलस्रेत नरककुंड बनकर रह गए हैं. अंधाधुंध विकास का परिणाम नदी और भूजल के प्रदूषण के रूप में सामने आया है. आये-दिन ग्लोबल वार्मिंग का खतरा बढ़ रहा है, आबादी व जल उपयोग में बढ़ोतरी हुई है, भूजल के दोहन की प्रवृत्ति तेजी से बढ़ रही है, नदी क्षेत्र पर अतिक्रमण बढ़ता जा रहा है और पानी में खारेपन की समस्या विकराल होती जा रही है. ये समस्याएं जल संकट और गहराएंगी. ऐसे में हमारे नीति-नियंता नदियों के पुनर्जीवन की उचित रणनीति क्यों नहीं बना सके, जल के बड़े पैमाने पर दोहन के बावजूद उसके रिचार्ज की व्यवस्था क्यों नहीं कर सके, वर्षा के पानी को बेकार बह जाने देने से क्यों नहीं रोक पाये और अतिवृष्टि के बावजूद जल संकट क्यों बना रहता है, यह क्यों समझ नहीं पा रहे हैं. वैज्ञानिक चेतावनी दे रहे हैं कि यदि जल संकट दूर करने के ठोस कदम न उठाये गए तो वह दिन दूर नहीं जब हम खुद मिट जायेंगे.

As posted in samaylive.com

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