Roar for Tigers

पीलीभीत टाइगर रिज़र्व: चूका वो नहीं चूक तो हम गए..

पीलीभीत टाइगर रिज़र्व: चूका वो नहीं चूक तो हम गए..

May 3, 2015

टाइगर रिजर्व और ईको टूरिज्म स्थल विकसित होने के बाद चूका बीच का नाम भले ही लोगों की जुबां पर आ गया, लेकिन बहुत कम लोगों को पता होगा कि यह चूका क्या है। दरअसल, नेपाल एवं उत्तराखंड की सीमा से लगे पहाड़ों की तराई में अंग्रेजों के जमाने तक चूका नाम की एक नदी बहती थी। उस नदी के उद्भव की कहानी एक चरवाहे की चूक से जुड़ी है, जिससे नदी का नाम चूका पड़ा। इस नदी को उस वक्त तराई का खास जलस्त्रोत माना जाता था। पहली पंचवर्षीय में शारदा सागर डाम बना तो स्वत: जलस्त्रोत वाली चूका नदी उसी में विलीन हो गई। चूका नदी के किनारे अंग्रेजों द्वारा बनवाए गए पुल व प्रकाश स्तंभ के निशान अभी भी मौजूद हैं। यह स्थल चूका पिकनिक स्पाट से कुछ दूर महोफ रेंज के जंगल में है। हालाकि नदी का कुछ हिस्सा सेल्हा बाबा की मजार व मझारा गुरुद्वारा के निकट अभी भी अवशेष के रूप में दिखाई पड़ता है।

पीलीभीत के महोफ रेंज जंगल में शारदा सागर डाम के किनारे वन विभाग ने 2001 में ही चूका बीच नाम से ईको टूरिज्म स्पाट विकसित किया था। गत वर्ष जब यह जंगल टाइगर रिजर्व घोषित किया गया तो चूका का नाम अंतर्राष्ट्रीय पटल पर चमक उठा। चूका का वातावरण जितना मनोरम है, उसके उदभव की कहानी उतनी ही रोमांचक है। आजादी से पहले तक इस इलाके में चूका नाम की एक नदी बहती थी। जिसका उदगम गोमती की ही भांति स्वत: जलस्त्रोत से था। यह नदी आगे जाकर शारदा नदी में मिल जाती थी। इस नदी के उदभव के बारे में किविदंती है कि सदियों पहले घोर जंगल में यहां किसी संत की झोपड़ी थी। उनके पास जल का एक ऐसा अक्षय पात्र था कि जंगल के चरवाहे व अन्य राहगीर पानी पीते थे। यह अक्षयपात्र एक ढक्कन से ढका रहता है। एक बार कोई प्यासा चरवाहा आया तो संत ने अक्षय पात्र से जल पीने की इजाजत दे दी, लेकिन अक्षय पात्र को पुन: ढकने की भी हिदायत दी। चरवाहा चूकवश अक्षय पात्र ढकना भूल गया और उसे अक्षय पात्र से जलधार बहने लगी। चूक से निकली नदी ही चूका नदी कही जाने लगी। माधौटांडा के राम मूर्ति सिंह योगेश्वर व धरनीधर सिंह किवदंती की तस्दीक करते हुए कहते हैं कि बुजुर्ग भी चूका नदी का यही इतिहास बताते रहे। आजादी के समय तक चूका नदी का बाकायदा अस्तित्व था। यहां पर अंग्रेजों के जमाने में प्रकाश स्तंभ आदि बनाकर रात्रि ठहराव की भी व्यवस्था की गई थी।

107309811

धीरे-धीरे स्वत:जलस्त्रोत बंद होने लगे तो नदी भी सिर्फ बरसाती नाला के मानिंद हो गई। प्रथम पंचवर्षीय योजना में जब शारदा सागर डाम का निर्माण हुआ तो चूका नदी का उदगम स्थल इसी में समाहित हो गया। यह स्थल जरूर चूका नाम से पहचाना जाने लगा। वर्ष 2001 में जब वन विभाग ने यहां ईको टूरिज्म स्पाट विकसित किया तो उसका नाम भी चूका ही पड़ गया। पीलीभीत टाइगर रिजर्व में यह इकलौता स्थल है, जहां तक पर्यटकों को जाने व ठहरने की व्यवस्था है। चूका नदी शारदा सागर के दक्षिणी हिस्से पर फीडर के पश्चिम से निकलती थी। यह नदी आगे सेल्हा बाबा की मजार के पास से होते हुए मझारा गुरुद्वारा से आगे जाकर शारदा नदी में विलीन हो जाती थी। अब नदी के कुछ अवशेष सेल्हा बाबा की मजार व मझारा गुरुद्वारा के पास दिखाई पड़ते हैं। बारिश के दिनों में इधर से जल का बहाव होता है। सेव इनवायरमेंट सोसायटी पीलीभीत के सचिव टीएच खान के मुताबिक महोफ रेंज के जंगल से पहले चूका नदी बहती थी। इसका अस्तित्व स्वत: जमीन से निकली जलधार से था। शारदा सागर डाम बनने के बाद इस नदी का अस्तित्व मिट गया। अब प्रदेश सरकार जिस प्रकार उद्गम स्थल की फिक्रमंद दिखाई पड़ती है, उसी प्रकार चूका का भी अस्तित्व बहाल करने पर विचार करना चाहिए।

 

 

 

As posted in Jagran.com

468 ad

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *