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Save Tiger मुहिम ने दुनिया में बढ़ाये बाघ, यूपी में सिमटे, पीलीभीत भी चपेट में

Save Tiger मुहिम ने दुनिया में बढ़ाये बाघ, यूपी में सिमटे, पीलीभीत भी चपेट में

Apr 13, 2016

लखनऊ: सेव टाइगर मुहीम रंग ला रही है। दुनिया भर में इस बात से ख़ुशी मनाई जा रही है की बाघों की संख्या बढ़ गई। मगर उत्तर प्रदेश के पास इसकी ख़ुशी मानाने के लिए कुछ नहीं। यूपी में लगातार कई वर्षों से बाघों की संख्या घट रही। नेपाली तस्कर यूपी के जंगल में घुसकर बाघों को मार रहे हैं। अपने उत्तर प्रदेश में टाइगर को बचाने वाला वन विभाग महकमा हाथ पर हाथ धरे बैठा हुआ है। वन विभाग की लापरवाही का नतीजा यह है कि यूपी के जंगलों से एक दशक में बाघों की संख्या 278 से घटकर 118 रह गई है।

जंगलों पर कमजोर निगरानी तंत्र का खामियाजा बेजुबान बाघों को अपनी जान देकर चुकानी पड़ रही है। प्रदेश के जंगल में सबसे ज्यादा बाघों पर मुसीबत दुधवा नेशनल पार्क और पीलीभीत टाइगर रिजर्व पर मंडरा रही है। यहां के जंगल नेपाली शिकारियों के लिए सैरगाह बन चुके हैं। पीलीभीत के जंगल में शारदा नहर में कई बाघों के शव इसी साल मिले जो इशारा कर रहे हैं यहां जंगल में जंगलराज चरम पर है।

बाघों की रहस्य्मयी मौतों से उठ रहे सवाल

पीलीभीत में 23 अप्रैल 2015 को शारदा नहर में बाघ का शव बहता हुआ मिला। यह नहर पीलीभीत टाइगर रिजर्व के दक्षिणी-पूर्वी छोर के पास बहती है। इस घटना से जंगल में हड़कम्प मचा। अधिकारी घटना स्थल पर पहुंचे। इस घटना पर वन विभाग के अफसरों ने बाघ की मौत का कारण उसके फेफड़े में पानी भर जाना बताया। इसके बाद मामले को रफा दफा करने की कोशिश की गई। दुधवा नेशनल पार्क में मई के महीने में शिकारियों द्वारा बाघ को पकड़ने वाला तार का जाल मिला। जिस पर वहां के अधिकारियों ने छिपाने की कोशिश की। मामला यह कहकर दबाने की कोशिश की गई कि वहां कर्मचारी काम कर रहे थे जो अपना तार भूल गए। यह चंद मामले हैं जो दुधवा और पीलीभीत के जंगल में बाघों के शिकार की ओर इशारा करते हुए मिले।

2 जनवरी 2016 को दुधवा में बाघिन की लाश मिली

4 जनवरी 2016 को दुधवा में एक बाघ के बच्चे की लाश मिली

पिछले चार साल में पूरे देश में बाघों की संख्या में तकरीबन 30 प्रतिशत का इजाफा हुआ। यूपी के जंगल को यह खुशी नसीब नहीं हुई। पीलीभीत टाइगर रिजर्व में 2010 में 38 बाघ थे जो वर्ष 2014 की गणना में 28 ही पाए गए। इसी तरह दुधवा नेशनल पार्क में 2010 की गणना में 30 के करीब थे जहां पर 20 की संख्या में ही बाघ रह गए हैं।

यूपी में ऐसे घट रहे हैं बाघ

1993-213

1995-191

1997-202

1999-240

2001-284

2003-283

2005-273

2010-117

2014-118

(रिपोर्ट वाइल्ड लाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया)

नदियों का कटान दुधवा और पीलीभीत के लिए मुसीबत

दुधवा नेशनल पार्क में नेपाल से आने वाली मोहना नदी के कटान और पीलीभीत में शारदा नहर के कटान से यहां के जंगल का एक बड़ा हिस्सा बड़े भूभाग में तब्दील हो चुका है। इस भूभाग में वन कर्मियों का जाना मुश्किल हो चुका है। इसी क्षेत्र में शिकारियों ने अपना ठिकाना बनाया है जहां से वह जंगल में घुसकर बाघों और अन्य वन्यजीवों के शिकार को अंजाम देते हैं। दुधवा में बाघ के अलावा गैंडे, हिरन, तमाम पक्षीयों की तस्करी हो रही है। वहीं पीलीभीत टाइगर रिजर्व में बाघ, तेंदुए, जंगली बिल्ली के साथ यहां की 325 प्रजातियों पर संकट मंडरा रहा है। बीते दिनों पीलीभीत के थाना क्षेत्र हजारा से कई बार शिकारियों और तस्करों को दबोचा जा चुका है।

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ऐसे काम करते हैं शिकारी

पीलीभीत के शारदा नदी के दक्षिणी हिस्से में जंगल है। इस जंगल के उत्तर में नेपाल है। नेपाल के रास्ते चीन के अंतर्राष्ट्रीय बाजार में बाघ की तस्करी होती है। पीलीभीत के जंगल में बसने वाले गद्दी जाति के लोग बाघ के शिकार में निपुण होते हैं। वह बाघ के शिकार के लिए जहर का उपयोग करते हैं। यह जहर बाघ के पेट में जलन पैदा करता है और वह पानी की ओर भागता है। अगर बाघ मैदान में मरा तो उसे शिकारी उठा ले जतो हैं और अगर वह शारदा नहर में मरता है तो उसका शव लेना शिकारियों के लिए मुश्किल हो जाता है। यही कारण है कि पीलीभीत में बीते एक वर्ष में चार मामले ऐसे पाए गए हैं जहां बाघ का शव शारदा नहर के किनारे मिला है। दुधवा नेशनल पार्क के आस पास रहने वाले थारू जनजाति शिकार करन में लिप्त पाए गए हैं। इनके रिश्तेदार नेपाल में बसे हैं जिनकी मदद से वह शिकार को अंजाम देते हैं।

वन कर्मियों की मिली भीगत

2011 और 2013 में बिजनौर के जंगल में तस्करों के गैंग से बाघ की आधा दर्जन खाल बरामद हुई थी। पकड़े गए लोगों ने दुधवा नेशनल पार्क के अंदर शिकारियों के गिरोह के सक्रिय होने की बात कही थी। मगर जब एसटीएफ ने पार्क में खोज बीन की तो वहां पर उन्हें ऐसी कुछ नहीं मिला। वर्ष 2015 फरवरी में नेपाल पुलिस ने दो भारतीयों को पकड़ा जिनके पास बाघ की खाल बरामद हुई थी। इन मामलों में वन विभाग के कर्मचरियों के नाम सामने आए मगर उनके खिलाफ कोई एक्शन नहीं लिया गया।

निगरानी तंत्र है कमजोर

पीलीभीत टाइगर रिजर्व में फॉरेस्ट गार्ड के 60 पद हैं लेकिन तैनात केवल 30 हैं। यही कारण है कि एक फॉरेस्ट गार्ड पर दो से अधिक बीट की जिम्मेदारी है। इसी तरह दुधवा नेशनल पार्क में भी वनकर्मियों की संख्या पार्क के क्षेत्रफल के हिसाब से कम है। दुधवा नेशनल पार्क के निदेशक संजय सिंह ने बताया कि पार्क में कर्मचारियों की कमी है। एक फॉरेस्ट गार्ड पर कई बीट हैं। वहीं एक रेंज ऑफिसर भी कई रेंज को संभाल रहा है।

वाइल्ड लाइफ एक्सपर्ट और टाइगर के संरक्षण के लिए काम कर रहे कौशलेंद सिंह ने बताया कि बाघ को बचाने के लिए टाइगर प्रोटेक्शन फोर्स बनना था। मगर सरकार की ओर से कोई कदम नहीं उठाए गया। अगर इस ओर वर्ष 2009 में ही ध्यान दे दिया गया होता तो बाघों के शिकार और तस्करी में कमी आती। बाघों की संख्या घटती नहीं। उन्होंने बताया कि प्रदेश में कई बार वन विभाग के अफसरों ने यह दावा कि पीलीभीत और दुधवा ने टाइगर के बच्चे देखे गए। आखिर जब टाइगर के बच्चे हुए तो इनकी संख्या में इजाफा क्यों नही हुआ।

 

 

As posted in Patrika.com

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