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पीलीभीत के करीब खटीमा में मारा गया बाघ, पहरेदार रहा बेख़बर

पीलीभीत के करीब खटीमा में मारा गया बाघ, पहरेदार रहा बेख़बर

Feb 26, 2015

खटीमा : भारत व नेपाल की सीमा के जंगलों में राजा की तरह विचरण करने वाला बाघ मार दिया गया। उसकी मौत से जंगल के पहरेदार ही बेखबर रहे। दस दिन बाद चील-कौवों के मंडराने व दुर्गध से शिकार का खुलासा हुआ। उसके बाद से ही अधिकारी मामले की लीपापोती में जुट गए। यही वजह है कि खबर फैलने के बाद से सारे अधिकारियों के मोबाइल फोन भी नॉट रिचेबिल हो गए। वहीं दूसरी ओर जहां एक ओर सीमांत के जंगलों में बाघों का कुनबा बढ़ा है। वहीं शिकारियों ने उनकी संख्या कम करने के लिए जंगलों में डेरा डाल दिया है। इससे बाघों पर खतरा बढ़ गया। तीन साल में बाघ को मारने की चौथी वारदात सामने आई है। सीमांत की 31 हजार से अधिक हेक्टेयर भूमि में सुरई, किलपुरा व खटीमा रेंज के जंगल फैले हुए हैं। जो बाघ, लैपर्ड, भालू, हाथी आदि संरक्षित वन्य जीवों से समृद्ध है। अकेले किलपुरा, खटीमा व सुरई रेंज के जंगलों में डब्लूडब्लूएफ की गई कैमरा ट्रैपिंग में 15 से 20 टाइगरों के मूव होने के संकेत मिल है। इन्हीं वजहों से सीमांत के जंगल शिकारियों के निशाने पर हैं। दो-तीन सालों से उनकी सक्रियता बढ़ने के प्रमाण मिले है। तीन साल के अंदर एक बाघ, एक बाघिन व एक लैपर्ड का शिकार तो सबके सामने उजागर हुआ। इसके अलावा चार लोगों के पास से दो बार बाघ व गुलदार की खालें भी बरामद की गई। दिसबंर 2011 में उत्तरी कुलियापानी जंगल में तस्करों ने बाघिन का मौत के घाट उतारकर उसकी हड्डियां भी उठा ले गए थे। ठीक एक महीने बाद ही बनबसा में एक गुलदार क्लच वायर में फंस कर मरा पाया गया था। अपै्रल 2013 में खटीमा रेंज के उत्तरी कंपार्टमेंट बनबसा नं. सात से चार शिकारी पकड़े गए। उनके पास से शिकार करने के कड़का समेत सभी संसाधन मिले। नवंबर 2013 में अंतरराज्यीय सीमा के महोफ रेंज में एक बाघ को मार दिया गया था। एक बार फिर बुधवार को नखाताल जंगल में बाघ के शिकार होने की घटना सामने आई है। हैरानी की बात यह है कि बाघ की मौत हुए दस दिन से ज्यादा का समय बताया जा रहा है, लेकिन जंगलों में नियमित रूप से गश्त होने का दावा करने वन व सुरक्षा महकमे को इसकी भनक तक नहीं लग सकी। यह बात चौकाने वाली है। यदि चील-कौवें वहां न मंडराते और वन वीट वाचर न पहुंचते तो शायद वन महकमे को बाघ की खबर ही नहीं मिल पाती। फिलहाल इस तरह की सुरक्षा व्यवस्था से बाघो बढ़े खतरे को महसूस किया जा सकता है।

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पकड़े जा चुके दस शिकारी

खटीमा : बावरिया गिरोह की सीमांत के जंगलों में पड़ी काली छाया के बाद सतर्क हुए वनकर्मी तीन साल में दस शिकारियों को दबोच चुके हैं। सबसे पहले सितंबर, 2012 में नरेंद्र सिंह व डम्मर सिंह को गुलदार की खाल के साथ पकड़ा गया। अपै्रल 2013 में हरियाणा हिसार के रंजीत, मन्नेराम, रामदास व मदने पकड़े गए। सितबंर, 2013 में कुख्यात शिकारी नरेश पकड़ा गया था। अगले महीने ही चार साथियों के साथ सईदा को भी वनकर्मियों ने दबोच लिया था।

हाथियों के आतंक से नहीं हो रही थी गश्त

खटीमा : जहां आज बाघ का शव मिला, उस जगह पर हाथियों ने आतंक मचा रखा था। यह कहना है रेंजर टीएस शाही का। बताया कि पिछले कई दिनों से वन कर्मी भी उस स्थान पर नहीं जा रहे थे। इसी वजह से बाघ के मरने की सूचना विभाग को देरी से मिली।

दो महीने में पांच वन्य जीवों की मौत

खटीमा : नया साल वन्य जीवों पर भारी पड़ रहा है। इसी साल पांच मौतें वन्य जीवों की हो चुकी है। जिनमें हाथी, गुलदार हिरन व बाघ है। हाथी व गुलदार की मौत ठंड से हुई थी।

 

 

As posted in Jagran.com

 

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