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पीलीभीत टाइगर रिज़र्व में गिद्धों को रास आने लगी बाघ की मांद

पीलीभीत टाइगर रिज़र्व में गिद्धों को रास आने लगी बाघ की मांद

Nov 5, 2014

पूरनपुर (पीलीभीत) : विलुप्त होने की कगार पर पहुंच चुके गिद्धों का कुनबा फिर पनपने लगा है। सुखद संकेत भी उस जंगल से मिले हैं, जो बाघ की मांद कहा जाता है। यानी हाल में घोषित किया गया टाइगर रिजर्व क्षेत्र। यहां का वातावरण गिद्धो को इस कदर रास आ रहा है कि हिमालय से तराई तक का लंबा सफर करके भी ये यहां पहुंच रहे हैं। गिद्धों की बढ़ती संख्या का ही असर है, कुछ दिनों तक मरे हुए जानवरों का जहां अंबार लगने लगा था अब वहां सफाई दिखने लगी है। पर्यावरण इस स्थिति से बेहद खुश हैं क्योंकि गिद्धों के विलुप्त होने से प्रकृति चक्र गड़बड़ाने का खतरा पैदा हो गया था। गिद्ध शक्ल सूरत से भले ही इंसानों को रास न आते हों, कहावत की दुनिया में भी उन्हें नकारात्मक समझा जाता हो मगर हकीकत में प्रकृति के प्रहरी हैं। सफाई कर्मी कहे जाते हैं। इसीलिए जब कुछ साल पहले एकाएक वे दिखना बंद हुए तो हर तरफ हलचल मच गई। वैज्ञानिक शोध में जुट गए, उन्हें वापस लाने के जतन होने लगे। खैर, अर्से बाद यह सुखद समाचार हरीपुर रेंज के जंगल से आया है। वाइल्ड लाइफ की ओर से किए गए हालिया सर्वे में खुलासा हुआ है कि पीलीभीत टाइगर रिजर्व की हरीपुर रेंज में तीन साल के भीतर गिद्धों की संख्या में तेजी के साथ बढ़ोत्तरी हुई है। जंगल में एक निश्चित स्थान पर इनके कई आशियाने देखे जा रहे है।पीलीभीत टाइगर रिजर्व की हरीपुर रेंज, बिनौरा रेंज, बराही के अलावा खीरी की नार्थ खीरी वन प्रभाग में गिद्धों की संख्या तेजी से बढ़ी है। अन्य कई स्थानों से भी गिद्ध जंगल में आकर डेरा जमा रहे हैं।

लगातार बढ़ रही संख्या

टाइगर रिजर्व में पाए जाने वाले गिद्धों की संख्या पर नजर डालें तो वृद्धि लगातार हो रही है। वाइल्ड लाइफ सोसायटी के सर्वे के अनुसार हरीपुर, बराही और बिनोरा बीट में इनकी संख्या वर्ष 2012 में 209, 2013 में 279 थी। वर्ष 2014 में संख्या इससे भी अधिक देखी गई है। एक अनुमान के मुताबिक, इस दफा आंकड़ा पांच सौ को पार करेगा। हालांकि, सर्वे दिसंबर के अंत तक पूरा हो सकेगा।

इस नस्ल के गिद्ध बढ़े

टाइगर रिजर्व में सात प्रजातियों के गिद्ध देखने को मिल रहे हैं। इनमें रेड हेडेड वल्चर, सिनेरियस वल्चर, यूरेशियन ग्रिफन, लांग विल्ड वल्चर, इंडियन व्हाइट वल्चर, इजिशियन वल्चर और हिमालयन वल्चर प्रमुख हैं। पिछले कई वर्षों के दौरान जंगल के आसपास गौढ़यों (दुधारु पशुओं का पालन) की संख्या बढ़ी है। इसी के साथ जानवर मरने की तादात भी बढ़ गई है। ऐसे में गिद्धों के लिए भोजन की पर्याप्त व्यवस्था हो जाने से इनकी संख्या बढ़ रही है। एक दशक पहले जब गौढ़यां नहीं थीं तो गांवों में पशुपालक अपने पशुओं को दूध बढ़ाने वाले इंजेक्शन देते थे। ऐसे पशु जब मर जाते तो उन्हें गांव के बाहर डाल दिया जाता। गिद्ध जब उन मरे पशुओं का मांस खाते तो इंजेक्शन के प्रभाव से उनमें बीमारियां फैलने लगीं। इसी से गिद्ध कम होने लगे थे। अब यह स्थिति बदली है। इसीलिए गिद्धों की संख्या बढ़ी है।

 

 

As posted in Jagran.com

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