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पशुओं को भी जीने दें

पशुओं को भी जीने दें

Jan 26, 2014

वन्य जीव विशेषज्ञ कीर्ति कारंथ पिछले 16 साल से वन्य जीवों और पर्यावरण संरक्षण पर अध्ययन कर रही हैं। उन्होंने विलुप्त हो रहे वन्य जीवों पर कई अहम शोधपत्र तैयार किए। कई अंतरराष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित कीर्ति कारंथ फिलहाल वाइल्डलाइफ कंजर्वेशन सोसाइटी की एसोशिएट कंजर्वेशन साइंस्टि हैं। पेश हैं उनके एक भाषण के संपादित अंश:

मेरा बचपन
मेरे पिता कोटा उल्लास कारंथ जाने-माने जंतु विशेषज्ञ हैं। उन्होंने प्राकृतिक संरक्षण के क्षेत्र में काफी काम किया है। मेरे दादा शिवराम कारंथ महान लेखक, विचारक और मशहूर डांसर थे। मेरे दादा को थियेटर में गहरी दिलचस्पी थी। जाहिर है, मेरी सोच और मेरे व्यक्तित्व पर इन दोनों का गहरा असर रहा है। मेरा बचपन पिता को जीव-जंतुओं की रक्षा के लिए संघर्ष करते हुए देखते बीता। साथ ही दादा जी के थियेटर प्रेम ने भी मुझे काफी प्रभावित किया। उन दोनों में अपने काम के प्रति गजब का जुनून था। काम के प्रति उनका यह जुनून मेरी प्रेरणा का स्रोत रहा है। सच कहूं, तो मेरा बचपन आम बच्चों की तरह खेलते-कूदते नहीं बीता।

जंतुओं से लगाव
मुझे आज भी याद है बचपन के वे दिन, जब मैं जंगलों में घंटों अपने पिता के साथ ऊंचे टावर पर बैठकर पशुओं की गतिविधियां देखा करती थी। ऐसा लगता था कि मानो बाघ और तेंदुए हमारी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा हों। धीरे-धीरे मैं उन्हें समझने लगी। मुझे आज भी उस बाघिन का किस्सा याद है, जिसे मेरे पिता ने दो बार ट्रांसमीटर लगा पट्टा पहनाया था। उसका नाम सुंदरी था। मेरे पिता ने छह साल तक उसकी गतिविधियों पर नजर रखी। ये सारी चीजें मेरे सामने हो रही थीं। सच कहूं, तो बाघ और चीते मेरे सबसे प्रिय साथी बन गए थे। तब मैं पांच साल की थी। उसके बाद जैसे-जैसे मैं बड़ी होती गई वन्य जीवन में दिलचस्पी बढ़ती गई।

अलग बचपन
मेरा बचपन आम बच्चों से बिल्कुल ही अलग था। मैं अपने पिता के साथ जंगलों में जाती थी। मुझे अपने साथ किसी तरह का शोर मचाने वाला यंत्र या खिलौना ले जाने की इजाजत नहीं थी। मैं अपने साथ किताबें या कलर भी नहीं रख सकती थी। बस मेरा साथ मेरी दूरबीन देती, जिसकी मदद से मैं शांत होकर जंगलों में मंडराते जानवरों-पक्षियों को देखती रहती थी। हम रोजाना छह से आठ घंटे तक किसी ऊंचे टावर पर बैठे रहते थे। कई बार ये घंटे और ज्यादा हो जाते थे। मैंने अपने जीवन के 16 साल ऐसे ही गुजारे हैं। जाहिर है, ऐसा करने में मुझे मजा आता था।

भारत की खूबी
हमारे देश में बहुत सारी खूबियां हैं। पर मेरे लिए भारत की सबसे बड़ी खूबी है यहां का लाजवाब वन्य जीवन। दुनिया के 40 फीसदी बाघ भारत में हैं। हमारे यहां शेर जैसी पूंछ वाले लंगूर भी हैं। दुनिया में इस प्रजाति के मात्र 500 लंगूर बचे हैं। हमारे यहां एक हजार से ज्यादा प्रजातियों के पक्षी पाए जाते हैं। मैं विलुप्त हो रही प्रजातियों पर अध्ययन कर रही हूं। इन जंतुओं को बचाना हमारी जिम्मेदारी है। हमें धरती पर सभी जीव-जंतुओं के महत्व को समझना होगा।

वन्य जीवों को जगह
दोस्तो, इस धरती पर वन्य जीवों का भी पूरा अधिकार है। हम जानते हैं कि समय के साथ आबादी का प्रसार बढ़ा है। जंगलों का दायरा सीमित हो रहा है। सवाल है कि जंगलों में रहने वाले जीव कहां जाएं? जब जंगल नष्ट होते हैं, तो वे आबादी की ओर भागने को मजबूर हो जाते हैं। कभी तेंदुआ, तो कभी बाघों के बस्ती में घुसने की खबरें आती हैं। जब वे हमारी बस्ती में आते हैं, तो हमें बुरा लगता है। हम कहते हैं कि उन्होंने हमारी फसलें खराब कर दीं, मवेशी-लोगों को मार दिया। तब हमारा संघर्ष होता है। कभी वे हमें मारते हैं, कभी हम उन्हें मारते हैं। हम अपने नुकसान के लिए उनसे बदला लेते हैं।  इस संघर्ष में हम वन्य जीवन को खोते हैं। वास्तव में, यह बहुत बड़ा नुकसान है।

हमारा अध्ययन
हमने हाल ही में कर्नाटक में एक अध्ययन किया। इस अध्ययन के तहत हमने राज्य के दो हजार गांवों का विश्लेषण किया। हमने यह जानने की कोशिश कि पिछले दस साल के दौरान यहां आबादी और जंगल के बीच किस तरह का तनाव रहा। आपको यह जानकर ताज्जुब होगा कि हमें इंसानों और पशुओं के बीच संघर्ष के करीब एक लाख मामले मिले। सबसे बड़ी बात यह थी कि 75 फीसदी मामलों में लोगों ने क्षतिपूर्ति के लिए आवेदन नहीं किया। हमें लोगों को जागरूक करना होगा। मैंने ऐसे लोगों की मदद के लिए एक वेबसाइट शुरू की है। यहां लोग मदद के लिए हमसे संपर्क कर सकते हैं। अगर हमें कहीं से भी जानवरों के हमले या किसी नुकसान की खबर मिलती है, तो हमारी टीमें वहां पहुंचकर प्रभावित लोगों की मदद करती हैं। हमारा मकसद वन्य जीवन की रक्षा करना और साथ ही लोगों को नुकसान से बचाना है।

मेरा सपना
आज हमारे सामने सबसे बड़ा सवाल यह है कि भारत में केवल चार फीसदी क्षेत्र को ही वन्य जीवन के लिए संरक्षित किया गया है। क्या हमें वन्य जीवों को और जगह नहीं देनी चाहिए? मेरा सपना है कि हम अपने देश में दस फीसदी क्षेत्र वन्य जीवन को दें। यह बहुत मुश्किल भी नहीं है। आज हम अपने इतिहास के सबसे बेहतरीन दौर में हैं। हमारे पास पैसा है, संसाधन हैं, और तकनीक भी। हमारे पास ऐसी कोई वजह नहीं है कि हम अपने वन्य क्षेत्र को न बढ़ा सकें। अब हमारे पास कोई बहाना भी नहीं है। मेरी आप सबसे अपील है कि वन्य जीवन को महत्व दें। मैं जानती हूं कि वन्य जीवन को दस फीसदी क्षेत्र दिलवाने के लिए काफी जद्दोजहद करनी पड़ेगी, पर मैं यह संघर्ष करने को तैयार हूं। उम्मीद करती हूं कि आप भी इस बारे में जरूर सोचेंगे।

As posted in livehindustan.com

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