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उत्तराखंड में 14 माह में छह बाघ, 86 तेंदुओं की मौत

उत्तराखंड में 14 माह में छह बाघ, 86 तेंदुओं की मौत

Jan 23, 2014

उत्तराखंड में वर्ष 2012 के प्रारंभ से फरवरी 2013 तक प्रदेश में कुल छह बाघों और 86 तेंदुओं की मौत हुई. इनमें से 32 मामलों में मौत का कारण अवैध शिकार और दुर्घटना रहे. देहरादून में जारी एक सरकारी रिपोर्ट में बताया गया है कि वर्ष 2012 के शुरू से अगले 14 महीनों के दौरान उत्तराखंड में छह बाघों की मौत हुई. इनमें से दो की मौत दुर्घटना में और चार बाघों की मौत प्राकृतिक कारणों से हुई. इस अवधि में तेंदुओं के जीवन पर गहरा संकट रहा क्योंकि उनकी मौत के कुल दर्ज 86 मामलों में से तीन अवैध शिकार और शेष दुर्घटना के रहे. अन्य 56 तेंदुओं की मौत प्राकृतिक कारणों से हुई. बाघों और तेंदुओं की अप्राकृतिक मौत रोकने के लिये उठाये गये कदमों के बारे में कहा गया है कि वन विभाग द्वारा वन क्षेत्रों में तैनात कर्मियों को प्रभावी रूप से गश्त करने तथा अपने-अपने क्षेत्रों में खुफिया तंत्र को मजबूत करने के निर्देश दिये गये है.  इसके अलावा, संवेदनशील तथा अतिसंवेदनशील क्षेत्रों के आसपास रहने वाले खानाबदोश जाति के वन गूजरों और कंजरों आदि के डेरों पर कड़ी नजर रखी जाती है तथा किसी प्रकार की घटना होने पर अपराधियों को पकड़ने के लिए नियमानुसार वैधानिक कार्रवाई की जाती है.  बाघों और तेंदुओं की अप्राकृतिक मौतों पर चिंता जाहिर करते हुए प्रसिद्ध पर्यावरणविद् पदमश्री अनिल प्रकाश जोशी ने इसे वन महकमे की लापरवाही और ढिलाई बताया है. उन्होंने कहा कि केवल वन तथा वन्यजीव संरक्षण की जिम्मेदारी संभालने वाला वन विभाग अपने काम को लेकर गंभीर नहीं है जिसकी वजह से वन क्षेत्रों में सक्रिय अपराधी वन्य जीवों को नुकसान पहुंचा कर कानून की पकड़ से बाहर निकल जाते हैं.  जोशी ने कहा कि वन्यजीवों की सुरक्षा के लिये जरूरी गश्त तथा अन्य कदम जमीनी स्तर पर भी उठाये जाने चाहिये.

As posted in samaylive.com

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