Roar for Tigers

पीलीभीत के जंगल से कम हो रहा वनराज का भोजन

पीलीभीत के जंगल से कम हो रहा वनराज का भोजन

May 11, 2015

पीलीभीत : तराई के पीलीभीत टाइगर रिजर्व के जंगल में वनराज बाघ के भोजन पर ही संकट खड़ा हो गया है। जंगल क्षेत्र में आएदिन चीतलों की मौत ने कारणों को खोजने पर मजबूर कर दिया है। हरदोई ब्रांच नहर में जवान बाघ का शव मिलने के बाद तृणभोजी वन्यजीवों की मौत का सिलसिला शुरू हो गया है। पीलीभीत टाइगर रिजर्व का कुल क्षेत्रफल 73022.8 हेक्टेयर एरिया है, जिसमें पीलीभीत का 71288 हेक्टेयर व शाहजहांपुर का 1736 हेक्टेयर शामिल हैं। बाघों के रहने के लिए 60279.80 हेक्टेयर एरिया रखा गया है, जिसे कोर जोन एरिया कहते हैं। शेष एरिया को बफर एरिया घोषित किया गया, जहां पसोचने पर मजबूर कर दिया है। इस जंगल में चीतल, हिरन, मोर, सांप, जंगली सुअर, भालू, काकड़ आदि वन्यजीव पाए जाते हैं। बाघ अपने भूख मिटाने के लिए बफर एरिया में आते हैं और शिकार करने के बाद अपने वासस्थल को लौट जाते हैं। मगर मौजूदा समय में बाघ के भोजन कहे जाने वाले तृणभोजी वन्यजीवों के जीवन पर संकट मंडरा रहा है। दो महीने पहले गजरौला क्षेत्र के शिवनगर गांव में हिरन की मौत हुई थी। इसके बाद टाइगर रिजर्व की संडई हाल्ट के पास नहर से चीतल का शव बरामद किया गया था। पिछले दिनों हरीपुर रेंज में संदिग्ध अवस्था में चीतल की मौत हो गई थी। शिकारियों के निशाने पर तृणभोजी वन्यजीव ही नजर आ रहे हैं। 23 अप्रैल को हरदोई ब्रांच नहर में जवान बाघ की मौत ने सबको हिलाकर रख दिया है। उसी नहर में दो चीतलों का शव संदिग्ध अवस्था में पाया गया। चीतल व हिरनों की मौत का सिलसिला रुकने का नाम नहीं ले रहा है। ऐसे में बाघ का भोजन दिनोंदिन कम होता जा रहा है।

वन राज्यमंत्री के सामने रखा मामला

पीलीभीत टाइगर रिजर्व की बराही रेंज में ही हरदोई ब्रांच नहर में दो चीतलों के शव मिलने का मामला वन राज्यमंत्री फरीद महफूज किदवई के सामने रखा गया, लेकिन उन्होंने जानकारी होने से इनकार कर दिया। उन्होंने तर्क दिया कि अमूमन हिरन व चीतल पानी पीने के तृणभोजी वन्यजीवों का किया जाए संरक्षण लिए नहर में आते हैं। पैर फिसलकर नहर में गिर जाते हैं। इन चीतलों की मौत ऐसे ही हुई होगी। फिर भी मामले को दिखवाया जा रहा है।

तृणभोजी वन्यजीवों का किया जाए संरक्षण

पीलीभीत टाइगर रिजर्व में तृणभोजी वन्यजीवों के संरक्षण की दिशा में कठोर कदम उठाए जाने की जरूरत है। अगर समय रहते संरक्षण के प्रयास नहीं किए, तो तृणभोजी वन्यजीव सपने जैसा हो जाएंगे। पिछले दिनों जंगल से भटककर एक बाघ खारजा नहर के पास पालतू जानवर पर हमला बोल दिया था। वन्यजीव प्रेमियों के मुताबिक, अगर जंगल में बाघ को भरपेट भोजन मिल रहा है, तो जंगल के बाहर क्यों आया। ऐसा नहीं है, तो बाघ की उम्र अधिक हो गई है।

 

 

As posted in Jagran.com

468 ad

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *