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जिम कार्बेट : जिनके नाम के बिना अधूरी है ‘बाघ’ की कहानी

जिम कार्बेट : जिनके नाम के बिना अधूरी है ‘बाघ’ की कहानी

Aug 2, 2015

अंतरराष्ट्रीय बाघ दिवस पर बाघ वाले उस आदमी की कहानी, जिसे दुनिया भर में बाघों की वजह से जाना गया़  मूल रूप से फिरंगी लेकिन भारत में जन्मे-पले-बढ़े कार्बेट बहुत ही खामोशी के साथ दो दशक तक बिहार को कर्मभूमि बना कर दुनिया भर में मशहूर हुए. भारत में बाघों की बात चलती है तो उनकी विविध प्रजातियां, उनकी विलुप्त होती दुनिया, उनका महत्व, उनके संकट आदि से बात शुरू होती है, वहीं खत्म भी हो जाती है़  लेकिन, जब भी बाघ पर बात चलती है तो एक इंसान ऐसा है, जिसका नाम जोड़े बिना बाघ की कहानी अधूरी-सी लगती है़  वह जरूरी नाम है जिम कार्बेट का़  वही जिम कार्बेट, जिसके नाम पर उत्तराखंड में जिम कार्बेट रिजर्व है़। वही जिम कार्बेट, जिनके नाम पर फिलहाल दुनिया में मौजूद बाघ की पांच प्रजातियों में से एक पैंथेरिया टिग्रेस कारबेटी है़  वही जिम कार्बेट, जो बहुत खामोशी के साथ, चुपचाप बिहार में दो दशक तक रहे, अपना काम करते रहे, बाघों की दुनिया को समझते रहे और बाघों की दुनिया को सबसे बेहतरीन तरीके से समझने के लिए बिहार ही में रहकर मशहूर भी हो गय़े  जिम कार्बेट ही वह शिकारी थे, जिन्होंने बाघों का सबसे ज्यादा शिकार किया, लेकिन उन्होंने ही दुनिया को बताया कि ‘ए टाइगर इज द लाजर्हर्टेड जेंटलमैन विद बाउंडलेस एंड एनॉर्मस स्ट्रेंग्थ़’’
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जिम कार्बेट पर गहराई से शोध व अध्ययन करनेवाले सेंट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ झारखंड के अंगरेजी विभाग में सहायक प्राध्यापक मयंक रंजन कहते हैं कि यह दुर्भाग्य है कि जिस बिहार में ही कार्बेट ने अपना जीवन गुजार दिया, उस बिहार में लोग उनके बारे में नहीं जानत़े और अपने देश में भी जो कार्बेट के बारे में जानते हैं, वे एक शिकारी के रूप में ही जानते हैं । कार्बेट दो दशक तक मोकामा रेलवे स्टेशन पर रहकर काम किये और उनकी ख्याति उस वक्त उस पूरे इलाके में एक उदार अधिकारी की बनी रही़  बकौल मयंक, जिम कार्बेट को महज शिकारी की तरह देखा जाता है और यही धारणा उनके बारे में बना ली गयी है, जबकि कार्बेट कोई शौकिया शिकारी नहीं थ़े । 1875 में जन्मे कार्बेट जब 21 साल की उम्र में बिहार के मोकामा में आये, तब से वे दूसरी वजहों से बाघों का शिकार करने लग़े  उन्हें देश भर में बाघों को मारने के लिए बुलाया जाता था और वे उसी बाघ को मारते थे, जो मैनइटर होते थे और जिनकी वजह से लोगों को खतरा रहता था़  बिहार में रहकर कार्बेट बार-बार कुमायुं जाते रहे, बाघों का शिकार करते रहे और फिर उन अनुभवों को बिहार में लौटकर ‘मैनइटर ऑफ कुमायुं’, ‘द टेंपल टाइगर एंड मैनइटर ऑफ कुमायुं’, ‘द जंगल लोर’, ‘द ट्री टॉप’ से लेकर ‘माई इंडिया’ तक में व्यक्त करते रह़े ।  इनमें ‘माई इंडिया’ तो उनकी एक ऐसी रचना हुई, जिससे उस समय के देश के सामाजिक-सांस्कृतिक-आर्थिक हालात को सबसे बेहतर तरीके से समझा जा सकता है और बहुत हद तक बिहार को भी़ जिम कार्बेट मोकामा स्टेशन पर ट्रांसशिपमेंट इंसपेक्टर के रूप में मोकामा स्टेशन पर 21 साल की उम्र में काम करने आय़े जब जिम कार्बेट मोकामा पहुंचे तो उनके पूर्ववर्ती अंगरेज अधिकारी ने कहा कि तुम यहां क्यों फंसने आये हो, सुबह वापस जाओ, यह काम करने की जगह नहीं। लेकिन उसी वक्त मोकामा स्टेशन के मास्टर रामशरण ने कार्बेट को कहा कि साहब आप रहिए, सब मिलकर संभाल लिया जाएगा़  कार्बेट कहीं वापस नहीं गये, वहीं रह गय़े  उनका काम मोकामा घाट से सिमरिया घाट तक रेलवे के माल को एक पार से दूसरे पार भेजना-भिजवाना रहता था़। इस काम को उन्होंने स्थानीय मजदूरों की सहायता से 20 सालों तक किया और यह अभी भी रिकार्ड है कि 20 सालों में कोई एक मजदूर एक बार भी जो कार्बेट के साथ काम करने आया, वह कार्बेट के वहां रहने तक कभी साथ छोड़कर, काम छोड़कर नहीं गया़  इसकी कई वजहें थी़  एक तो कार्बेट उन बिहारी मजदूरों के साथ बिहारी जैसे बन गये थे और दूसरे वे उनके हितों की रक्षा के पक्ष में उतरनेवाले में दुनिया के दुर्लभ फिरंगी अधिकारियों में से थ़े  एक बार की बात है कि मजदूरों को मजदूरी का भुगतान नहीं हुआ़  मजदूरों के सामने संकट गहराता गया़  दूसरी ओर अंगरेज सरकार कार्बेट का वेतन तो भेजने को तैयार थी लेकिन मजदूरों के पैसे में विलंब करने के मूड में थी़।कार्बेट ने रात बारह बजे टेलीग्राम किया कि अगर कल दिन के बारह बजे तक मजदूरों का पैसा नहीं आएगा तो काम ठप होगा और मेरा पैसा मजदूरों के पैसे के साथ ही भेजने की जरूरत है़  दुनिया के मशहूर शिकारी और बाघ के साथ खेलनेवाले कार्बेट का यह मानवीय पक्ष था़  ऐसी कई घटनाएं बिहार में रहते हुए घटी, जिसका जिक्र उन्होंने ‘माई इंडिया’ में विस्तार से किया है़ । वे कुमायुं में जाकर शिकार करते थे, दुनिया भर में जाने जाते थे लेकिन बिहार रहते हुए बिहार को समझने की कोशिश करते थे, बिहारी बने रहते थ़े  उनकी किताब ‘माई इंडिया’ में ‘माई लाईफ एट मोकामा घाट’ को पढ़ते हुए साफ होता है कि वे कितनी बारीक नजरों से बिहार को देख समझ रहे थ़े  वे कपड़े देखकर, कंधे पर गमछा रखने, किसी के उठने-बैठने के अंदाज से उसकी जाति तक का पता लगा लेने जैसी बातें लिखे हैं। प्रो मयंक कहते हैं, भारत में अंगरेजी लेखकों पर जॉर्ज ऑरवेल और रुडयार्ड किपलिंग पर ही बात शुरू होकर खत्म हो जाती है, उन पर ढेरों काम भी मिलेंगे, लेकिन जिम कार्बेट की तरह न तो ईमानदारी से समझनेवाला कोई इकोलॉजिस्ट लेखक था, ना भारतीय मर्म को समझनेवाला और उसमें रमनेवाला कोई अंगरेज लेखक भारत आया और न ही उतना लोकप्रिय हो सका, जिसका एक नमूना यह है कि 1996 तक ही ‘मैनइटर ऑफ कुमायुं’ की छह लाख प्रतियां बिक चुकी थी़।
As posted in Prabhatkhabar.com
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