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टाइगर रिजर्व में लागू किया गया हाईअलर्ट

टाइगर रिजर्व में लागू किया गया हाईअलर्ट

Jan 23, 2014

कानन पेंडारी जू एवं रिसर्च सेंटर में बुधवार को 22 चीतलों की प्रथम दृष्टया एंथ्रेक्स से मौत के बाद बस्तर के कांगेर वैली पार्क व इंद्रावती टाइगर रिजर्व में हाईअलर्ट जारी कर दिया गया है। सीसीएफ व्ही रामा राव ने डीएफओ स्तर के अधिकारियों को सुरक्षा के लिहाज से ऎहतियात बरतने को कहा है। हालांकि अधिकारी यह मान रहे हैं कि बस्तर में फिलहाल खतरे की स्थिति नहीं है, इसके बावजूद ऎहतियातन कदम उठाए जा रहे हैं।

गौरतलब है कि बुधवार को बिलासपुर जिले के कानन पेंडारी जू व रिसर्च सेंटर में 22 चितलों की मौत हो गई थी। पीएम के बाद वेटनरी डॉक्टर एंथ्रेक्स वायरस से मौत की संभावना जता रहे हैं। बताया जा रहा है कि संभवत: कौओं के जरिए चीतल एंथ्रेक्स के शिकार हुए होंगे। इस घटना से पूरे प्रदेश में वन विभाग के अधिकारी चिंतित है।

इंद्रावती में नहीं है व्यवस्था

बस्तर के इंद्रावती टाइगर रिजर्व में मौजूद बाघों की सुरक्षा के लिहाज से ऎसा कोई अभियान फिलहाल नहीं चलाया जा रहा है। आलम यह है कि 2005 की गणना में 27 बाघों की पुष्टि हुई थी। इसके बाद से विभाग के पास टाइगर रिजर्व में बाघों के होने की जानकारी तक नहीं है। इससे यह बताना संभव नहीं है कि इस इलाके में कितने बाघ वर्तमान में है। हालांकि इसके लिए अब कवायद शुरू हो गई है और वन अधिकारियों को जंगल में वन्य प्राणियों की गणना के लिए प्रशिक्षण दिया जा रहा है। बीते दिन वन अधिकारियों ने प्रशिक्षण के दौरान चीतल के झुंड के अलावा भालू के होने की पुष्टि की थी।

बस्तर में भी यही हाल

बस्तर में भी वन्य प्राणियों की स्थिति बहुत अच्छी नहीं है। यहां के वन्यप्राणियों को विषाणुजनित रोगों मसलन एन्थ्रेंक्स, सॉर्स, वल्र्ड फ्लू, स्वाइन फीवर और मेडकाऊ जैसी घातक बीमारियों से बचने के लिए टीकाकरण का कोई निर्धारित शेड्यूल नहीं हैं।

विश्व वन्य जीव निधि ने भी चेतावनी दी है कि छत्तीसगढ़ के बाघों को अब कुत्तों से भी खतरा है। कुत्तों से फैलने वाले वाइरस, कैनाइन डिस्टेम्पर वाइरस से बाघों की जान तक जा सकती है। इस गंभीर वायरस से निपटने के लिए विभाग ने अब तक कोई पुख्ता तैयारी नहीं की है।

बाघों पर हो सकता है खतरा

भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान (आईवीआरआई) के अनुसार एंथ्रेक्स की तरह केनाइन डिस्टेंपर वायरस (सीडीवी) से बाघों को खतरा हो सकता है। यह वायरस आमतौर पर कुत्तों में पाया जाता है। यह खसरे के विषाणु से मिलता-जुलता है। इसकी पहचान 20वीं सदी में हुई थी और इसे थाइलासाइन (तस्मानिया टाइगर) की मौत के लिए जिम्मेदार माना जाता है।

अफ्रीका के सेरेंगेती और मसाईमारा में 20 से 30 प्रतिशत शेरों की मौत इसी वायरस के प्रकोप से होती है। भारत में उत्तर प्रदेश के पीलीभीत अभ्यारण्य में एक बाघ की मौत इस वायरस से हो चुकी है।

मध्यप्रदेश वन विभाग ने सीडीवी से निपटने की तैयारी भी शुरू कर दी है। यहां के पन्ना टाइगर रिजर्व ने वेटनरी कॉलेज के साथ बीमारी निगरानी परियोजना शुरू की है। यहां एक बाघ की मौत संदिग्ध हालत में हुई थी, जिसमें कीड़े ज्यादा मिले थे।

निगरानी के निर्देश

बस्तर में इस तरह के किसी खतरे की स्थिति नहीं है। इसके बाजूवद डीएफओ स्तर के अधिकारियों को पार्क व राष्ट्रीय उद्यान में ऎहतियातन निगरानी रखने के निर्देश दिए गए हैं। वन्य प्राणियों की सुरक्षा के लिहाज से समय-समय पर वेटनरी विभाग की मदद से टीकाकरण अभियान चलाया जाता है।

As posted in patrika.com

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