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सुख-सौभाग्य के लिए यहां की जाती है बाघ की पूजा

सुख-सौभाग्य के लिए यहां की जाती है बाघ की पूजा

Mar 27, 2015

भारतीय संस्कृति हर जीव में परमात्मा का अंश मानती है, इसीलिए यहां सिर्फ निराकार परामात्मा की ही नहीं बल्कि उनकी प्रतिमा के अलावा वनस्पतियों और विभिन्न जीव-जंतुओं तक की पूजा की जाती है। यहां हर जीव का अस्तित्व बरकरार रखने की प्राचीन परंपरा है। सर्प, वानर, वृषभ, गौ के अलावा पीपल, तुलसी आदि में भी भगवान का अंश मानकर उनका पूजन किया जाता है। इसी कड़ी में छत्तीसगढ़ के 2 स्थानों पर बने मंदिर लोगों के आकर्षण का केंद्र बने हुए हैं।

बाघ बचाने की अनूठी पहल
देश-प्रदेश में बाघ का जीवन बचाने के लिए भले ही अब जद्दोजहद की हो रही हो, लेकिन यहां के आदिवासी काफी समय पहले से ही इसे आराध्य देव के रूप में पूजते आ रहे हैं। छत्तीसगढ़ के मरवाही के पास भाड़ी और धनपुर गांव में तो वनराज का मंदिर भी है, जहां बाघ को आराध्य देव के रूप में स्थापित किया गया है। इन मंदिरों में ग्रामीण रोज बाघ की प्रतिमाओं के सामने मत्था टेकते हैं। नवरात्र में यहां काफी चहल-पहल रहती है। वन में निवास करने वाले समुदायों के धार्मिक मान्यताओं के जानकार डॉ. विजय बताते हैं, बाघेश्वर देव खेती के देवता हैं। वन क्षेत्रों में खेती जंगल के बीच में की जाती थी, जहां हमेशा वनराज का खतरा बना रहता था। इस समुदाय की मान्यता है कि वनराज की प्रतिमा या प्रतीक चिह्न स्थापित कर दें तो बाघ का डर तो खत्म हो जाता है, अन्य जानवर भी नजदीक नहीं आते हैं। अगर इनकी पूजा में खामी हो जाए तो वनराज किसी को अपना शिकार बना लेता है। ऐसे में बाघ धरनी पूजा भी की जाती है और लोहे की कील से बाघ की सीमा बांध दी जाती है जिसे गांव के बरूआ या गुनिया अभिमंत्रित करते हैं।

यहां के रक्षक हैं वनराज
भाड़ी गांव जंगल और जानवरों को बचाने के लिए मिसाल है। यहां के साहस राम कहते हैं, जंगल का ये राजा जंगल और गांव में आने वाली हर विपदा से हमारी रक्षा करते हैं। वे गांव के रक्षक हैं। जंगल के राजा को सम्मान देने के लिए हम बाघेश्वर भगवान को मानते हैं। देववती मार्को कहती हैं, गांव में विवाह, हवन, पूजन या अन्य शुभ आयोजन की शुरुआत बाघेश्वर के दर्शन के बाद ही शुरू होती है।

वन्यजीवों को बचाने की प्रेरणा
गांव के मोहन लाल का कहना है कि वन्यजीव जंगल में नहीं होंगे तो जैव विविधता पर असर पड़ेगा। जंगल में रहने वाले जानवरों का सम्मान करना हमारा कर्तव्य है, इसलिए हम सभी गांव वाले उन्हें देवतुल्य मानते हैं। ऐसा करने से गांव में जानवरों को कोई नुकसान नहीं पहुंचाता। गांव वालों के इस अनोखे तरीके प्रयास से वन्य जीवों और वन को बचाने की प्रेरणा भी मिलती है।

 

 

As posted in Rajasthanpatrika.patrika.com

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