Roar for Tigers

गिर रहा है भूजल स्तर बहुतरफा प्रयास से होगा समाधान

गिर रहा है भूजल स्तर बहुतरफा प्रयास से होगा समाधान

Apr 19, 2014

भारत दुनिया की सतह क्षेत्र के 2.4 फीसदी भाग पर है, पर इसकी आबादी दुनिया की तकरीबन 17 फीसदी है। हालांकि हमारे देश में दुनिया के जल संसाधन का 4 फीसदी हिस्सा मौजूद है। देश के अलग-अलग जलवायु होने के कारण स्थान के अनुरूप पानी की सुलभता नहीं है। ऐसे में कई हिस्सों में पेयजल तक की कमी है। सिंचाई के लिए आज के वैज्ञानिक और संसाधनों वाले युग में भी ऊपर की ओर देखना पड़ता है। पेश है देश की भूजल की स्थितियों और संभावनाओं को खंगालती हुई लोकेश प्रसाद आनन्द की रिपोर्ट…
देश में जमीन के अंदर के पानी का स्तर जिस तरीके से और भी नीचे जा रहा है, वह पर्यावरणविदों के साथ अन्य वर्गों के लिए भी चिंता का विषय बनता जा रहा है। पानी के बगैर जीवन की कल्पना ही नहीं की जा सकती है, पर इसका सबसे बड़ा स्रोत भूजल है और उसमें ही कमी आती जा रही है। गांव के बुजुर्गों का भी कहना है कि पहले अमुक फुट पर पानी उपलब्ध हो जाता था, पर अब जमीन के नीचे का पेयजल पाने के लिए ज्यादा मशक्कत करनी पड़ती है। यह वर्तमान के लिए समस्या को सुलझाने का समय भी है और भविष्य के लिए यह तो बड़े खतरे की घंटी है, क्योंकि पृथ्वी पर जीवों के जीवन का बड़ा आधार पानी ही है।

A resident paddles his canoe past dead fish found on the banks of the Parana de Manaquiri River

सैटेलाइट से पता चला है कि देश का भूजल घट रहा है। भारतीय भूजल की बड़ी तस्वीर अमेरिका के नेशनल एयरोनॉटिक्स एंड स्पेस एडमिनिस्ट्रेशन और जर्मन एयरोस्पेस सेंटर द्वारा एक संयुक्त प्रयास के रूप में सामने आई है। इससे भी पता चला है कि देश में भूजल का गिरता स्तर चिंताजनक है। वैसे, भूजल जीवों के लिए पानी का स्थायी, सुरक्षित और पवित्र बड़ा टैंक है। भूजल गुरुत्वाकर्षण का उदाहरण भी है। पानी के बहते हुए स्रोतों का उपयोग सभी या सभी स्थान के लोग नहीं कर सकते हैं। ऐसे में जमीन के भीतर का पानी महत्वपूर्ण हो जाता है। यह मौसम के प्रभाव को भी कम करने में सक्षम है। हम पाते हैं कि गर्मी के दिनों में जमीन के अंदर का पानी ठंडा और जाड़े के दिनों में जमीन का पानी गर्म होता है। भूजल अक्सर सस्ता और अधिक सुविधाजनक होता है।सतह पर मौजूद पानी की तरह इसमें प्रदूषित होने के खतरे भी कम होते हैं। इसलिए यह आम तौर पर सार्वजनिक पानी की आपूर्ति के लिए प्रयोग किया जाता है। भूजल संयुक्त राज्य अमेरिका में प्रयोग करने योग्य पानी के भंडारण का सबसे बड़ा स्रोत प्रदान करता है। सतह के जलाशयों और झीलों की क्षमता की तुलना में इसमें कहीं अधिक पानी होता है।

bb

अपने देश में भी कई नगर निगम के पानी की आपूर्ति पूरी तरह भूजल से होती है। भूजल प्रदूषण सबसे अधिक बार जमीन पर कचरे के अनुचित निपटान का परिणाम है। प्रदूषण के अन्य प्रमुख कारणों में है- घरेलू रसायनों व कचरा गड्ढों की भराई, औद्योगिक अपशिष्ट लैगून, भूमिगत तेल भंडारण टैंक, पाइपलाइनों से लीक और सेप्टिक सिस्टम। भूजल स्वाभाविक रूप से वर्षा और बहती हुई नदियों के जमीन के भीतर रिसाव हो जाने के कारण से एकत्रित होता है। भूजल एक लंबे समय तक हो सकता है। हाल में हुए शोध से यह पता चला है कि भूजल का वाष्पीकरण विशेष रूप से शुष्क क्षेत्रों में स्थानीय जल चक्र में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। भूजल एक अत्यधिक उपयोगी और अक्सर प्रचुर संसाधन है। हालांकि अधिक उपयोग या ओवरड्राफ्ट मानव उपयोगकर्ताओं के लिए और पर्यावरण के लिए बड़ी समस्या पैदा कर सकते हैं। यह सबसे स्पष्ट समस्या है। अमेरिका के कैलिफोर्निया और टेक्सास के साथ-साथ अपने देश में पंजाब का क्षेत्र इसका बड़ा उदाहरण है, जहां भूजल के अधिक उपयोग के कारण से उसका स्तर ज्यादा नीचे हो गया है।

dry-riverbed

भूजल का स्तर गिरने के साथ एक समस्या यह भी है कि इसमें खारे पानी के घुसपैठ का खतरा बढ़ जाता है। भूजल की भी पारिस्थितिकी होती है, जिसको बनाये रखना भी जरूरी है। समुद्रतटीय क्षेत्रों में बड़ा खतरा यह भी होता है कि भूजल का स्तर गिरने के बाद समुद्र के पानी की घुसपैठ हो सकती है। इससे वहां का पानी मीठा होने के बजाये नमकीन हो सकता है। भूजल प्रदूषण अपनी तरह से काम करता है और यह भीतर ही भीतर आंदोलन की तरह फैलता है। चूना पत्थर के कारण से भूजल प्रदूषित होता है। भूकंप के कारण से ऐसी दरार बन जाती है, जिससे प्रदूषित जल स्वच्छ जल में मिल जाता है, जिससे भूजल प्रदूषित होता है। खेती के लिए सिंचाई होने के बाद भी इसमें प्रदूषण होता है, क्योंकि खेती के कृत्रिम उर्वरक पानी के साथ जमीन के अंदर जाते हैं। परमाणु कचरे का ठीक से निपटान नहीं किए जाने के कारण से भी भूजल प्रदूषित हो जाता है। बड़े पैमाने पर भूजल प्रदूषण का एक और उदाहरण है गंगा। उत्तरी भारत और बांग्लादेश स्वाभाविक रूप से आर्सेनिक से होने वाले भूजल के प्रदूषण से ग्रसित हैं।

ऐसे में भूजल के गिरते स्तर और देश में जल की बढ़ती हुई मांगों से यह आवाज उठनी शुरू हुई कि देश की नदियों को आपस में जोड़ दिया जाए। तर्क यह दिया गया कि इससे देश के उन हिस्सों को बहुत ही फायदा होगा, जो मानसून की वक्र दृष्टि का शिकार हो जाने के कारण से सूखे से ग्रसित हो जाते हैं। साथ ही उन इलाकों को भी फायदा होगा, जहां नदियों में बारिश का ज्यादा पानी आ जाने के कारण से बाढ़ आ जाती है। ऐसे में नदी जोड़ो परियोजना दक्षिण में 16 प्रायद्वीपीय नदियों और उत्तर में 14 हिमालयी नदियों को जोडऩे का प्रस्ताव है। इसके पक्ष में यह कहा गया कि हजारों हेक्टेयर खेतों की सिंचाई इस कारण से संभव हो सकेगी। साथ ही 34,000 करोड़ किलोवाट बिजली पैदा हो सकती है। बाढ़ को नियंत्रित करने और सूखे की संभावना को नष्ट करने के साथ-साथ इससे नौवहन दक्षता में वृद्धि होगी। कुछ पर्यावरणविदों का मानना है कि नदी जोड़ो परियोजना एक बुरा सपना हो सकता है। उनका मानना है कि नदियों को जोडऩा एक पारिस्थितिकी आपदा होगी। कुछ पर्यावरणविदों का कहना है कि स्वच्छ जल की आपूर्ति की मांग कई गुना बढ़ी है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि नदियों के प्रवाह स्तर को ही बदल दिया जाए। एक तो जमीन के भीतर की स्थिति है, जिसका मुंह या तो बंगाल की खाड़ी या अरब सागर की ओर है। दूसरी आपत्ति उन्होंने यह जताई कि इससे नदियों के अपने प्राकृतिक गुण और जैविक स्थिति को नुकसान होगा। उनका यह भी मानना है कि सभी नदियां हर 70 से 100 साल में अपना बहाव की सीमा को बदल देती है। यह एक प्राकृतिक घटना है। ऐसे में बदलाव एक बार शुरू होने के बाद फिर पूरी परियोजना व्यर्थ हो जाएगी। इसलिए उन्होंने कहा कि योजना अकल्पनीय है। इसमें बड़े पैमाने पर अपूरणीय क्षति की क्षमता है। जैव विविधता को नुकसान होगा और पानी के नीचे की ओर प्रवाह में कमी आएगी। मत्स्य पालन और जंगली जीवन को नुकसान भी होगा। इससे लोगों के विस्थापन के साथ-साथ राज्यों के बीच जल बंटवारे के झगड़े और भूकंपीय झटके की स्थिति ज्यादा बन सकती है। ऐसे पर्यावरणविदों ने कुछ शोधों के उदाहरण का भी हवाला दिया है। उनका कहना है कि केन और बेतवा नदियों को जोडऩे के आसपास के क्षेत्र में मध्य प्रदेश का पन्ना टाइगर राष्ट्रीय उद्यान पड़ता है। यह क्षेत्र वन्य जीव संरक्षण अधिनियम 1972 के अंतर्गत आता है, जहां कई लुप्तप्राय प्रजातियों के लिए एक वास है। यहां देश के 50 वर्ग किलोमीटर से अधिक का भाग जलमग्न हो जाएगा। बड़े वनों की कटाई में समय भी लगेगा और इस क्षेत्र की पारिस्थितिकी भी खत्म हो जाएगी। इसी प्रकार प्रसिद्ध जिम कार्बेट नेशनल पार्क में हाथी रिजर्व क्षेत्र के डूबने के साथ अपूरणीय नुकसान उठाना पड़ेगा। नदियों को जोडऩे के नुकसान पर ऐसे पर्यावरणविदों का यह भी मानना है कि हिमालय क्षेत्र की नदियों को प्रायद्वीपीय नदियों से जोडऩे पर 40,000 किमी लंबी अंतर्देशीय जलमार्ग होगा, जिसमें भारी मानव विस्थापन होगा।

 

मानव विस्थापन के साथ एक बड़ी त्रासदी यह भी है कि उस जगह की ऐतिहासिकता तो एक तरह से खत्म हो ही जाती है। जिन लोगों का विस्थापन होता है, उनकी एक साथ यादों के आधार की ही मौत हो जाती है। फिर उस जगह की खास वनस्पतियों का भी खात्मा हो जाता है। खास जीव भी नष्ट हो जाते हैं, क्योंकि उनकी जीवित रहने की एक खास दशा होती है। इसलिए नदियों के जोडऩे के मसले को ‘संदेह में एक निर्णय’ भी कहा जाता है। आलोचकों का कहना है कि इसके बुरे सामाजिक-आर्थिक परिणाम होंगे। यह मामला सुप्रीम कोर्ट में गया। वहां न्यायाधीशों ने 27 फरवरी, 2012 को समयबद्ध तरीके से नदियों को जोडऩे की परियोजना पर अपना फैसला दिया। इसमें केंद्र सरकार को एक उच्च स्तरीय समिति गठित करने को कहा। साथ ही केंद्र और राज्य सरकारों को निर्देश दिया गया। माननीय कोर्ट ने कहा कि परियोजना के कार्यान्वयन, सामाजिक तनाव, राजनीतिक अस्थिरता और सड़क झगड़े पर भी गौर किया जाए। देश के कुछ हिस्सों में पहले से ही पर्याप्त मात्रा में गुणात्मक पानी की उपलब्धता की स्थिति तेजी से बिगड़ रही है। इसलिए ठोस सुझाव देने को भी कहा गया। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी चिंता जताई कि सभी संभव स्थलों पर जल भंडारण क्षमता त्वरित होनी चाहिए और ऐसी व्यवस्था हो, जिससे बाढ़ एवं सूखा का प्रकोप न हो।

 

देश में हर साल तकरीबन 40 लाख हेक्टेयर आवधिक बाढ़ का अनुभव करता है। भारत में प्रतिवर्ष बाढ़ से प्रभावित औसत क्षेत्र 7.5 मीटर है, जबकि प्रभावित फसल क्षेत्र 3.5 मीटर है। इसके अलावा जीवन और घरेलू संपत्ति के नुकसान से बाढ़ के विनाशकारी प्रभाव बढ़ जाते हैं। बाढ़ के मैदानों में रहने वाले लोगों के मन में असुरक्षा और भय की भावना ज्यादा होती है। बाढ़ जलीय-वन्य जीवन, वनस्पतियों और बाढ़ के मैदानों में कीमती जैव विविधता प्रभावित करते हैं। असम, उत्तर प्रदेश, अरुणाचल प्रदेश, उत्तराखंड, बिहार व उड़ीसा के कई हिस्सों में भूमि बाढ़ के मैदानों मेंं तब्दील हो जाती है। पश्चिम बंगाल भी इस बाढ़ की चपेट से नहीं बच पाता है। बांधों से विस्थापित लोगों के पुनर्वास से संबंधित विवाद बड़े होते हैं और उससे राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था को बहुत नुकसान होता है। लेकिन बांधों के निर्माण के फायदे को दरकिनार नहीं किया जा सकता है। भाखड़ा बांध के निर्माण से पंजाब के पिछड़े क्षेत्र खेती के लिए विकसित क्षेत्र में बदल गए। इसलिए इस पर भी गौर किया जाना जरूरी है कि भाखड़ा नंगल परियोजना के पूरा होने से पहले पंजाब क्या था। प्रदूषित पानी में आर्सेनिक और फ्लोराइड से देश में लाखों लोगों को खतरा है। फ्लोराइड की उच्च सांद्रता में सेवन से गर्दन और पीठ को गंभीर नुकसान होता है। दंत समस्याओं की एक शृंखला के तौर पर यह उपस्थित होता है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के कुछ अध्ययनों से एक भयानक तस्वीर उभरती है। इस पर गौर किया जाना जरूरी है।

छोटे बांधों के साथ विवाद
छोटे बांधों पर विवाद अप्रासंगिक है। बुनियादी तथ्य यह है कि ये परियोजनाएं हाइड्रोलॉजिकल और क्षेत्रीय स्थिति पर निर्भर करती हैं। विशिष्ट आवश्यकता इस पर है कि पर्यावरणीय सुरक्षा उपाय विभिन्न एजेंसियों द्वारा समन्वित तरीके से कार्यान्वित हो रहे हैं या नहीं।

देश की जल आवश्यकताओं की वजह से अत्यधिक आवश्यक है कि जीवन की गुणवत्ता में गिरावट जनसंख्या वृद्धि से न हो जाए। साथ ही औद्योगीकरण और शहरीकरण विकास के लिए जारी रहे। सामाजिक तनाव, राजनीतिक अस्थिरता और सड़क झगड़े पहले से ही पर्याप्त मात्रा में पानी की उपलब्धता की कमी से देश में अनुभव किया जा रहा है। यह बिगड़ती स्थिति का प्रमाण भी है।

क्या जल विज्ञान है ?
पानी हमारी सबसे कीमती प्राकृतिक संसाधनों में से एक है। इसके बिना पृथ्वी पर कोई जीवन नहीं होगा। जल विज्ञान पृथ्वी की जटिल पानी की व्यवस्था को समझने में मदद देता है और पानी की समस्याओं को सुलझाने में भी मदद करता है। इसी रूप में इसे एक विज्ञान के रूप में विकसित किया गया है। जल विज्ञान पृथ्वी पर पानी और पानी के लिए मानव की भागीदारी और उपयोग के बारे में जानकारी देता है।

जल विज्ञान क्या है ?
जल विज्ञान घटना, वितरण और आंदोलन है। पृथ्वी के जल का गुण इसमें शामिल है कि विज्ञान और जलीय चक्र के प्रत्येक चरण के भीतर पर्यावरण के साथ उनका रिश्ता है। जल चक्र पानी वाष्पीकरण के कारण शुद्ध होते हैं।

सामान्यतया महासागरों से वाष्पित जल वापस जमीन पर वर्षा द्वारा आता है। यह ऐसी सतत प्रक्रिया है, जो चलती रहती है। पानी वर्षा या बर्फबारी के रूप में गिरते हैं और इसके निरंतर चक्र में कई रास्ते होते हैं।

यह पानी जीवों द्वारा इस्तेमाल होता है, मिट्टी में सोखा जाता है और कुओं-जलाशयों-झरनों में आता है। नदी के तौर पर यह प्रवाहित होती है। जमीन के नीचे का पानी सिंचाई या जीवों के इस्तेमाल के तौर पर सामने आता है। पानी से बिजली बनती है और उद्योगों में भी इसका इस्तेमाल होता है।

जल विज्ञान पानी का अध्ययन है
पानी हमारे सबसे महत्वपूर्ण प्राकृतिक संसाधनों में से एक है। इसके बिना पृथ्वी पर कोई जीवन नहीं होगा। हमारे इस्तेमाल के लिए उपलब्ध पानी की आपूर्ति प्रकृति द्वारा सीमित है। खूब पानी पृथ्वी पर नहीं है। यह सही समय पर और सही गुणवत्ता की सभी जगह में हमेशा नहीं है।

रासायनिक कचरे आज हमारे पानी की आपूर्ति में बाधा के रूप में दीख रहे हैं। जल विज्ञान धरती की जटिल पानी की व्यवस्था को समझते हैं और पानी की समस्याओं को सुलझाने में मदद करने के लिए आवश्यकता के जवाब के तौर पर सामने आते हैं।

जल विज्ञान में करियर
जो छात्र गणित, सांख्यिकी, भूविज्ञान, भौतिकी, कंप्यूटर विज्ञान, रसायन विज्ञान और जीव विज्ञान कोर्स के तौर पर लेते हैं, उनके लिए इसमें उनका अच्छा करियर है। सार्वजनिक वित्त, पर्यावरण कानून, सरकार की नीति और विशेषज्ञों के साथ संवाद के रूप में इसमें करियर है। लेखन और भाषण में स्पष्ट रूप से संवाद स्थापित करने के लिए यह किसी भी पेशेवर व्यक्ति को मौका देता है।

यह सरकारी नेताओं को सलाह देने या पानी के मुद्दों पर आम जनता को सूचित करने के लिए भी उपयोगी है। वैज्ञानिकों और इंजीनियरों के साथ एक टीम के हिस्से के रूप में भी इसकी उपयोगिता है। इसलिए जल विज्ञान आज और कल के लिए रोचक और चुनौतीपूर्ण करियर विकल्प के तौर पर सामने आता है।

भूजल गार्जियन की जरूरत
भूजल गार्जियन बनना अब जरूरी हो गया है। हम अपने आसपास पानी की बर्बादी को रोकने में प्रमुख भूमिका अदा कर सकते हैं।

साथ ही अपनी भावी पीढ़ी यानी बच्चों को भी इस संबंध में शिक्षा दे सकते हैं, जिससे वे पानी के प्रति जागरुक हों और जल बर्बादी को रोकने की मुहिम में वे भी भागीदार के तौर पर सामने आएं। इसके लिए विद्यालय और कॉलेज के स्तर पर जागरुक किया जाना जरूरी है। साथ ही कार्यशाला या सेमिनार के माध्यम से भी इस मामले पर प्रगति पाई जा सकती है।

बॉटलिंग संयंत्रों से घट रहा पानी
अब ऐसा भी कहा जा रहा है कि देश में बॉटलिंग संयंत्रों के आसपास भूजल घट रहा है। जैसे- कोका कोला का देश में 52 से अधिक पानी प्रधान बॉटलिंग संयंत्र चल रही है। इस संबंध में केरल का उदाहरण दिया जाता है। वहां पर इस संयंत्र के कारण लगातार सूखा पड़ रहा है। भूजल और स्थानीय कुएं सूख चुके हैं।

6,150 घन मीटर प्रति व्यक्ति भंडारण क्षमता है उत्तरी अमेरिका में
6,013 घन मीटर प्रति व्यक्ति भंडारण क्षमता है रूस में
4,729 घन मीटर प्रति व्यक्ति भंडारण क्षमता है ऑस्ट्रेलिया में
2,486 घन मीटर प्रति व्यक्ति भंडारण क्षमता है चीन में

 

As posted in business.bhaskar.com

468 ad

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *