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क्या दुनिया से विलुप्त हो जाएगा हमारा राष्ट्रीय पशु!

क्या दुनिया से विलुप्त हो जाएगा हमारा राष्ट्रीय पशु!

Aug 17, 2014

विकास की चाह में मानव द्वारा किए जा रहे अंधाधुंध प्राकृतिक दोहन का नुकसान इंसानों को तो उठाना पड़ ही रहा है, बेजुबान और निर्दोष जानवरों को भी उसकी बड़ी कीमत चुकानी पड़ रही है.

इसके चलते आज जहां पशु-पक्षियों की तमाम प्रजातियों का अस्तित्व लगभग समाप्त हो गया है, वहीं कितनी प्रजातियां ऐसी हैं जो दिनोंदिन विलुप्त होने की ओर बढ़ रही हैं. भारत का राष्ट्रीय पशु बाघ भी ऐसी ही प्रजातियों में से एक है. एक आंकड़े के अनुसार 20वीं सदी की शुरुआत तक धरती पर बाघों की संख्या तकरीबन एक लाख थी, लेकिन मौजूदा आंकड़ों के अनुसार वर्तमान में बाघों की संख्या महज 3200 रह गई है. बाघ की कुल नौ प्रजातियों में से तीन प्रजातियां तो पूरी तरह से खत्म भी हो चुकी हैं, शेष छह प्रजातियों में से कई प्रजातियों की मौजूदगी के विषय में अभी संदेह की ही स्थिति बनी हुई है. मूलत: बाघ दक्षिण एशिया और दक्षिण-पूर्व एशिया समेत रूस के कुछ पूर्वी क्षेत्रों में पाए जाते हैं.भारत के अलावा एशिया के चीन, नेपाल, बांग्लादेश, कंबोडिया, इंडोनेशिया आदि में भी कमोबेश बाघों की मौजूदगी है. इनमें सर्वाधिक 1411 (अनुमानित) बाघ भारत में ही हैं. लेकिन उपरोक्त सभी देशों में से कोई भी देश ऐसा नहीं है जहां बाघ अपने अस्तित्व के लिए संघषर्रत न हों. चूंकि बाघ को भारत के राष्ट्रीय पशु का गौरव प्राप्त है, अत: यहां उसकी कम होती संख्या के प्रति आए दिन चिंता जताई जाती रहती है और उसके  संरक्षण के लिए हमेशा से काफी प्रयास भी होते रहे हैं. भारत सरकार द्वारा बाघों के संरक्षण के लिए तमाम प्रयास किए गए हैं.

इनमें राष्ट्रीय स्तर पर संचालित बाघ परियोजना प्रमुख है जिसका आरंभ सन् 1973 में किया गया. इसके तहत कई बाघ अभयारण्य बनाए गए और समय-समय पर इनकी तादाद बढ़ाई जाती रही. आज देश में 35 से अधिक बाघ अभयारण्य हैं. बाघ अभयारण्यों में किसी भी तरह की आपराधिक गतिविधि पर अंकुश लगाने के लिए सरकार द्वारा वन्यजीव संरक्षण अधिनियम में संशोधन करके उसे और भी कड़ा किया गया. इससे देश में बाघों की कम होती संख्या पूरी तरह से रुकी तो नहीं, पर उस पर कुछ विराम जरूर लगा है. इस परियोजना के आने से ठीक पहले तक देश में 1872 बाघ थे जिनकी संख्या में इस परियोजना के लागू होने के बाद से अब तक यानी तकरीबन चार दशक में केवल 450 बाघों की कमी आई है.  यह देखते हुए स्पष्ट है कि सरकार के बाघ संरक्षण के प्रयासों के कारण भारत में बाघों के कम होने की रफ्तार कुछ हद तक थमी जरूर है, लेकिन उनकी संख्या में बढ़ोतरी अब भी दूर की कौड़ी नजर आती है.वैसे, बाघों के कम होने का मुख्य कारण तो धरती पर उनके अनुकूल जीवन संभावनाओं का खत्म होते जाना ही है. इसके अलावा बाघों का शिकार और उनके अंगों की अवैध तस्करी प्रमुख कारक है.

दरअसल, बाघों की हड्डियां, खून व चमड़ी आदि  तमाम रोगों से लेकर कामोत्तेजना पैदा करने वाली दवाएं तक बनाने में काम आते हैं. इस नाते विश्व बाजार में इनकी कीमत बहुत अधिक है. ऐसे में पैसा कमाने के लिए आपराधिक लोगों द्वारा उनका शिकार किया जाता है.सरकारी प्रयासों से बाघों के कम होने की गति जरूर थमी है, लेकिन इनकी संख्या बढ़ाने में सफलता नहीं मिल पा रही है. लिहाजा आज जरूरत है कि सरकार केवल बाघ संरक्षण पर ध्यान देने की बजाय बाघ संवर्धन को भी अपनी प्राथमिकता में शामिल करे. बाघ संवर्धन के लिए अनिवार्य है कि अभी देश में मौजूद नर-मादा बाघों के संयोग से अधिकाधिक शावक उत्पन्न हों. चूंकि बाघ एक बार में दो से तीन शावक तक पैदा करते  हैं इससे स्पष्ट है कि उनकी प्रजनन क्षमता अत्यंत उच्च है. इस उच्च प्रजनन क्षमता का उपयोग उनके तीव्र संवर्धन के लिए करना चाहिए. इसके लिए सरकार को राष्ट्रीय स्तर पर ठोस योजना तैयार कर कार्य करने की जरूरत है. सरकार को देश के ऐसे प्रजनन क्षमता वाले सभी नर और मादा बाघों की एक सूची तैयार करवानी चाहिए.

इसके बाद व्यवस्थित ढंग से उनके बीच संयोग उत्पन्न करवाया जाए.  ऐसा करने से  बाघ प्रजाति संवर्धित तो होगी ही, बाघों की एक नई, स्वस्थ व मजबूत पीढ़ी भी हमारे सामने होगी. यह काम न सिर्फ  भारत में बल्कि विश्व स्तर होना चाहिए. यही एक ऐसा उपाय है जिसके जरिए बाघ प्रजाति को स्थायी तौर पर संरक्षित किया जा सकता है, अन्यथा यह वह दिन दूर नहीं जब बाघों की दहाड़ इतिहास की बात हो जाएगी.

 

As posted in Samaylive.com

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