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पीलीभीत के जंगल की खिसकती ‘ज़मीन’

पीलीभीत के जंगल की खिसकती ‘ज़मीन’

Jun 8, 2014

पीलीभीत : हरियाली से लकदक तराई में भी जंगलों की जमीन खिसक रही है। विकास की अंधी दौड़ में न सिर्फ हरियाली का ‘कत्ल’ हो रहा है, बल्कि नई पौध भी नहीं फलफूल पा रही। सारे नियम सिर्फ कागजों में सिमटकर रह गए हैं। आलम यह है कि एक सूखा पेड़ काटने के एवज में न दो पेड़ लगते हैं, अगर पौधे रोप भी दिए गए तो वे जवां होने से पहले ही दम तोड़ जाते हैं। हालात को लेकर वन विभाग भी परेशान है। उसे जंगल का दायरा बढ़ाने के लिए पर्याप्त खाली जमीन नहीं मिल पाती है। यही वजह है, तराई के जिला पीलीभीत में हरियाली लगातार घट रही है। हर साल वन महोत्सव के दौरान विभिन्न सरकारी विभागों के अफसर पौधे तो बड़े शौक से लगाते हैं, नतीजे कुछ नहीं दिखते। लगाए जाने वाले पौधों की देखभाल के मामले में सरकारी अफसरों एवं संस्थाओं का रवैया हरियाली बढ़ाने में सबसे बड़ा गतिरोध है। यदि लगाए जाने वाले पौधों की नियमित देखभाल की व्यवस्था सुनिश्चित कर दी जाए, तो घने जंगल न सही, हरियाली सलाम रह सकेगी।

सिर्फ नाम का पौधारोपण

पिछले साल सामाजिक वानिकी विभाग ने पूरनपुर एवं बीसलपुर मार्गों समेत कई अन्य स्थानों पर विभिन्न प्रजातियों के 48 हजार 125 पौधे लगाए। कुल 77 हेक्टेयर भूमि पर पौधा रोपण किया गया।

गतिरोध : इन पौधों की तीन साल तक लगातार देखभाल होनी चाहिए। साथ ही पौधे सूखने अथवा जानवरों द्वारा नष्ट होने से बचाना भी विभाग की जिम्मेदारी है। दिक्कत यह है कि इन कार्यो के लिए शासन से विभाग को समय पर बजट नहीं मिल पाता। इस वजह से तमाम पौधे विभिन्न कारणों से नष्ट हो जाते हैं। हालांकि, सामाजिक वानिकी विभाग का दावा है कि नियमित देखभाल और पौधों की सिंचाई कराई जाती है। अलबत्ता पांच प्रतिशत पौधे अक्सर नहीं चल पाते।

समाधान : पौधारोपण के साथ ही उनकी सिंचाई एवं देखभाल के लिए पहले से बजट का आवंटन कर दिया जाए। साथ ही जिन कर्मियों पर पौधों की देखभाल करने की जिम्मेदारी है, लापरवाही बरतने पर उनके खिलाफ कार्रवाई हो तो पौधे नष्ट होने की समस्या काफी हद तक दूर हो सकती है।

सूखते पौधे, बेपरवाह अफसर

कलक्ट्रेट स्थित जिस गांधी सभागार में आएदिन अफसरों की मीटिंग होती है। उसी के परिसर में वर्ष 2012 के दौरान रोपे गए अनेक पौधे सूखकर नष्ट हो गए। हालांकि इन पौधों को लगाए जाने के दौरान देखभाल के लिए अफसरों ने निर्देश भी दिए थे, लेकिन बाद में जिम्मेदार कर्मियों तथा निर्देश देने वाले अफसर दोनों की इस बात को भुला बैठे। यदि नियमित रूप से देखभाल होती रहती तो इन पौधों को सूखने से बचाया जा सकता था।

गतिरोध : पौधों की देखभाल का निर्देश देकर भूल जाने की अफसरों को आदत पड़ चुकी है। उन्हें तो पौधारोपण का लक्ष्य पूरा करने से मतलब होता है।

समाधान : लगाए गए पौधे सूखने के प्रति जवाबदेही तय होनी चाहिए। जिससे जिम्मेदार कर्मचारी अपने कर्तव्य के प्रति सजग रहें।

जमानत जब्त मंजूर, पौधा लगाना नहीं

कई साल पहले ही शासन ने हरियाली बचाने के लिए सख्त नियम जारी किया था। तय किया था कि सूखे वृक्ष कटवाने के लिए परमिट जारी करते समय ही संबंधित लोगों ने इस बात के लिए जमानत राशि जमा करा ली जाए। इसमें जितने सूखे वृक्ष काटे जा रहे हैं, उससे दोगुने पौधे खाली हुए स्थान पर लगाने थे। ऐसा हो भी रहा है। सामाजिक वानिकी विभाग में सूखे वृक्षों के कटान के लिए परमिट जारी कराने वालों से नए पौधे लगाए जाने के लिए जमानत राशि जमा करा ली जाती है। यह दीगर बात है कि 75 प्रतिशत लोग सूखे वृक्ष कटाने के बाद नए पौधे नहीं लगाते। विभागीय अफसरों के अनुसार जब्त की जाने वाली जमानत राशि का प्रयोग बाद में विभाग के पौधारोपण पर कर दी जाती है। विभाग को हर साल तीन से चार लाख रुपये तक की जमानत जब्त करनी पड़ रही है।

गतिरोध : एक सूखा पेड़ काटने के एवज में दो नए पौधे उसी स्थान पर लगाए जाने के नियम का सख्ती से पालन नहीं कराया जा रहा। इसी वजह से पूराने वृक्षों का सफाया हो रहा और नए लग नहीं पा रहे।

समाधान : सूखे पेड़ कटने के तुरंत बाद विभागीय कर्मियों को मौके पर भेजकर नए पौधे लगवाने की व्यवस्था सुनिश्चित की जानी चाहिए। इस मामले में जब सख्ती होने लगेगी तो लोग खुद ही नियम का पालन करना सीख जाएंगे।

चोरी से पेड़ काटने वालों पर अंकुश नहीं

चोरी से पेड़ काटने की घटनाएं आएदिन सामने आती रहती हैं। पिछले दिनों शहर के ड्रमंड राजकीय इंटर कॉलेज परिसर में खड़े नीम के दो पेड़ चोरी से काट लिए गए। इसी तरह सड़कों के किनारे खड़े वृक्षों में से भी रातोंरात कटान हो जाता है। जंगल और उसके बाहर दोनों ही स्थानों पर चोरी से पेड़ काटने की घटनाएं होती रहती हैं। कई बार तो विभागीय कर्मियों की मिलीभगत से पेड़ कट जाते हैं। हालांकि वन विभाग और सामाजिक वानिकी विभाग दोनों ही नियमित पेट्रोलिंग का दावा करते हैं।

सामाजिक वानिकी विभाग के प्रभागीय निदेशक रामेश्वर राय के मुताबिक यदि पौधों की नियमित देखभाल होती रहे तो लगाए गए पौधों में से 95 फीसदी जीवित रहते हैं। तराई के इस जिले में तमाम जगह निचली भूमि है। बरसात में पानी भर जाने की वजह से पौधारोपण के लिए भूमि मिलना मुश्किल हो जाता है। वर्ष 2013 से पहले लगे पौधों के बारे में कोई जानकारी नहीं, लेकिन पिछले साल विभाग ने जितने भी पौधे लगाए, उन सबकी नियमित रूप से देखभाल हो रही है। कभी-कभी बजट की कमी आड़े आ जाती है, लेकिन इससे कोई कार्य प्रभावित नहीं होने दिया जाता।

पब्लिक के बोल

निरंजन कुंज में रहने वाले पुरुषोत्तम जायसवाल कहते हैं कि तराई के इस जिले में हरियाली लगातार कम होती जा रही है। इसका प्रमुख कारण सरकारी स्तर पर लापरवाही एवं जन जागरूकता की कमी है। नई विकसित होने वाली कालोनियों में हरियाली को बढ़ाने के उपाय होने चाहिए।

अशोक कॉलोनी निवासी बलवीर सिंह के मुताबिक अपने आसपास के वातावरण में हरियाली को महत्व देना आज की सबसे बड़ी जरूरत है। इसके लिए लोगों को जागरूक होना पड़ेगा। अगर प्रत्येक व्यक्ति ये ठान ले कि उसे अपने जीवन में कुछ पौधे लगाने हैं और उनकी देखभाल की जिम्मेदारी भी निभानी है तो हरियाली बढ़ाने का यह सबसे बेहतर तरीका हो सकता है।

मुहल्ला थान सिंह में रहने वाले तुषार अग्रवाल कहते हैं कि सड़कों के किनारे खड़े पेड़ रातोंरात कट जाते हैं। सूखे वृक्षों का परमिट लेकर ठेकेदार हरा भरा बाग काट डालते हैं। विभागीय लापरवाही की वजह से यह सब होता है। पेड़ काटे जाने पर प्रभावी ढंग से अंकुश लगना चाहिए।

राजा बाग निवासी कमल कुमार के मुताबिक प्रकृति ने इस जिले को भरपूर हरियाली दी लेकिन लोग अपने स्वार्थ के लिए हरे पेड़ काटने के बाज नहीं आते। वन विभाग और सामाजिक वानिकी के अफसरों को कड़ाई से इस पर अंकुश लगाना चाहिए।

As posted in Jagran.com

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