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गांवों में बागों का हो रहा सफाया

गांवों में बागों का हो रहा सफाया

Jan 29, 2014

पीलीभीत : होलिका दहन स्थलों की बढ़ती संख्या हरियाली का सफाया कर रही है। जंगल पर लगातार दबाव बढ़ रहा है। गांवों के आसपास बाग बगीचे खत्म होते जा रहे हैं। होलिका दहन के नाम पर यूं ही भारी मात्रा में लकड़ी की खपत होती रही तो पर्यावरण के लिए गंभीर संकट खड़ा हो सकता है। वन विभाग, सामाजिक वानिकी विभाग के अफसरों के साथ ही पर्यावरण कार्यकर्ता इस स्थिति को लेकर काफी चिंतित हैं। पुराने जमाने में तो गांवों में सिर्फ एक स्थान चिन्हित होता था, जहां सभी लोग मिलकर होलिका दहन करते थे। इसमें कोई भेदभाव नहीं होता था। इसी तरह नगरीय क्षेत्रों में भी अनेक स्थानों पर होलिका दहन की परंपरा नहीं थी। सीमित स्थानों पर होली जलाई जाती थी, वहीं पर तमाम लोग एकत्र होकर होलिका पूजन करते थे। धीरे-धीरे समाज में मनमुटाव बढ़ने लगा तो होलिका दहन स्थलों की संख्या भी बढ़ने लगी। अब तो हालत यह है कि नगरीय क्षेत्रों में एक ही मुहल्ले में कई स्थानों पर होलिका दहन होता है। इसी प्रकार गांव में भी होलिका दहन स्थलों की संख्या में बढ़ोत्तरी हो गई। इसी का नतीजा है कि जिले में हरियाली घट रही है। कई दशक पहले तो प्रत्येक गांव के बाहर हरे-भरे बाग बगीचे होते थे। सड़कें भी छायादार वृक्षों से आच्छादित थीं। अब तस्वीर बदली हुई नजर आती है। गांव के आसपास बाग खत्म हो रहे हैं। सड़कों के किनारे खड़े रहने वाले वृक्षों का भी तेजी से सफाया होता जा रहा है। प्रकृति ने तराई के इस जिले को 71 हजार 288 हेक्टेयर क्षेत्रफल में घना जंगल दिया है। लेकिन जंगल पर लगातार कटान का दबाव बढ़ रहा है। होली निकट आते ही सामाजिक वानिकी क्षेत्र एवं जंगल में अवैध रूप से वृक्षों के कटान की रफ्तार तेज हो जाती है। इससे पर्यावरण के लिए खतरा बढ़ता जा रहा है। इस स्थिति को लेकर वन विभाग, सामाजिक वानिकी विभाग के अफसरों के साथ ही पर्यावरण संरक्षण के लिए सक्रिय स्वयंसेवी संगठनों के कार्यकर्ता काफी चितिंत हो उठे हैं। कितना अच्छा रहे, जब लोग जागरुक होकर यह तय कर लें कि गांव या मुहल्ले में एक ही स्थान पर होलिका दहन किया जाएगा। इससे लकड़ी की बचत के साथ ही पर्यावरण को भी बचाने में काफी मदद मिल सकेगी।

As posted in jagran.com

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