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30 साल में अकेले ही 1360 एकड़ में उगा डाला पूरा जंगल!

30 साल में अकेले ही 1360 एकड़ में उगा डाला पूरा जंगल!

Apr 3, 2015

तीन दशक तक चले अपने प्रयास की बदौलत एक दृढ़निश्चियी इंसान ने रेतीले टापू पर जंगल उगाने का करिश्मा कर दिखाया है। असम में जोरहाट के रहने वाले जादव पाएंग ने यह करिश्मा राज्य से बहने वाली ब्रह्मपुत्र नदी के बीच एक टापू में किया है जो कभी निर्जन व रेतीला हुआ करता था। उनके घर के करीब से बहती ब्रह्मपुत्र नदी का यह टापू अब जंगल का रूप ले चुका है। टापू तक 54 वर्षीय जादव अपनी पुरानी छोटी नौका में पहुंचते हैं। मवेशी पाल कर गुजारा करने वाले जादव को पर्यावरणीय मुद्दों की अच्छी समझ है और वह जलवायु परिवर्तन पर भी खूब बातें करते हैं। टापू पर करीब 550 हैक्टेयर में फैले जंगल तक पहुंचने के लिए किनारों पर उगी एलीफैंट ग्रास तथा बांस के झुरमुट के बीच से रास्ता बनाना पड़ता है। जंगल हिरणों, खरगोशों, वानरों, सांपों, तेंदुओं, जंगली भैंसों तथा हाथियों का घर बन चुका है जो शायद तैर कर या बह कर इस टापू पर पहुंचे होंगे। करीब 52 प्रजाति के पक्षी भी इसे अपना बसेरा बना चुके हैं।

जादव ने टापू पर पौधारोपण का अभियान 1979 में आई भीषण बाढ़ के बाद शुरू किया जिसकी वजह से हजारों सांप बह कर इस रेतीले टापू पर पहुंच गए थे। इनमें से अनेक पेड़-पौधों के अभाव में तेज धूप से मर गए जिससे प्रकृति प्रेमियों को बहुत दुख पहुंचा था।जादव बताते हैं, ‘‘मैं उन मरे हुए सांपों के करीब बैठ कर खूब रोया था। मैंने सोचा कि अगर पेड़ न रहे तो इंसानों की भी यही गत होगी। मैंने फैसला किया कि मैं अपना जीवन पौधारोपण को समॢपत कर दूंगा।’’ जब असम वन विभाग ने जादव  की प्रार्थना नहीं सुनी तो उन्होंने अपनी मिसिंग जनजाति के लोगों से सम्पर्क किया जिन्होंने ऊंची घास तथा बांस के बीज दान में दिए। जादव ने मिट्टी के घिसाव को रोकने के लिए उन्हें टापू के किनारों पर बो दिया।

jadav payeng

जीवन के 35 सालों का अधिकतर समय जादव ने अक्सर इस टापू पर एकांत में फलों के पौधों को बोते या उनकी छंटाई करते हुए बिताया है। मवेशियों को घास चराते हुए उन्हें अपने लगाए नन्हे पौधों से बातें करने की आदत भी रही है। घर पर उनकी पत्नी मवेशियों को सम्भालतीं और दूध बेचतीं। उनका परिवार भी कई बार टापू पर उनके साथ रहता था। जादव कहते हैं, ‘‘खाद के अतिरिक्त मैं लाल चींटियां भी लाया जो मिट्टी को उपजाऊ बनाने का काम करती हैं। बीज बोने के बाद जल्द ही मिट्टी से घास, झाड़ तथा पौधे उगने लगे।’’

 

उनकी देखभाल के बीच तरह-तरह के पेड़-पौधे टापू पर तेजी से बढऩे लगे। हरियाली ने जंगली जीव-जंतुओं को आकर्षित किया जिनमें हाथी भी शामिल हैं जो टापू पर उगी घास खाना पसंद करते हैं। रॉयल बंगाल टाइगर तथा गैंडों जैसे दुर्लभ जानवरों ने भी जंगल पर बसेरा बना लिया। यह जंगल आज एक भरा-पूरा पारिस्थिकी तंत्र बन चुका है। हाल ही में यहां दिखाई दीं चील व मधुमक्खियों ने टापू पर भोजन शृंखला को सम्पूर्ण कर दिया है। ब्रह्मपुत्र नदी अपने साथ बहा कर लाई मिट्टी को कई स्थानों पर जमा करती रहती है जिससे नदी में कई जगहों पर टापू बन जाते हैं लेकिन जल्द ही उनमें से अधिकतर रेतीले टापू पानी के तेज बहाव में बह जाते हैं परंतु यह टापू काफी बड़ा है और पेड़-पौधों ने इसे स्थायी बनाने में सहायता की है।

2008 में पहली बार मोलाई के जंगल की तरफ ध्यान आकर्षित करने वाले वरिष्ठ फॉरैस्ट अफसर गुनिन साइका कहते हैं कि जादव ने टापू पर अधिकतर फल के पेड़ तथा घास उगाई जिससे पक्षी एवं जानवर आकर्षित हुए और उनसे बीजों को टापू पर फैलने में मदद मिली। जादव ने हर साल करीब10 हैक्टेयर में पौधारोपण किया जबकि बाकी इलाकों में पक्षियों तथा जानवरों ने बीज फैला दिए। साइका कहते हैं कि जादव ने कतार में पेड़ नहीं लगाए जैसा कि वन विभाग करता है। साथ ही उन्होंने बीज नदी के किनारों तथा स्थानीय लोगों से जमा किए। इस करिश्मे के लिए जादव को असम के मुख्यमंत्री तरुण गोगोई के अलावा अनेक संस्थाएं सम्मानित कर चुकी हैं। जवाहर लाल यूनिवर्सिटी ने उन्हें ‘फॉरैस्ट मैन ऑफ इंडिया’ करार दिया है।

 

 

As posted in Punjab.punjabkesari.in

Jan 21, 2014

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