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सवा साल में 10 सफेद बाघ और 3 बंगाल टाइगर की हो गई मौत

सवा साल में 10 सफेद बाघ और 3 बंगाल टाइगर की हो गई मौत

Apr 30, 2014

प्रजनन कार्यक्रम के तहत वंशावली बढ़ाने के लिए अलग-अलग राज्यों से दिल्ली के चिडिय़ाघर में लाए जाने वाले सफेद बाघ और बंगाल टाइगर की लगातार हो रही मौतों ने चिडिय़ाघर प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवालिया निशान लगा दिया है। चिडिय़ाघर में पिछले सवा साल के दौरान 10 सफेद बाघ और 3 बंगाल टाइगर की मौत हो चुकी है। इतना ही नहीं इस दौरान एक नील गाय, एक बर्मा गाय, एक हिमालयन भालू, 2 चिंकारा, 5 चीतल, 5 हिरण और एक गौर को भी अपनी जान से हाथ धोना पड़ा है। चिडिय़ाघर में विभिन्न जानवरों की हो रही लगातार मौतों के पीछे चिकित्सकों की कमी तमाम वहजों में से एक प्रमुख वजह है। चिडिय़ाघर में रह रहे छोटी-बड़ी 110 प्रजातियों के 1,556 जानवरों के लिए सिर्फ एक सरकारी चिकित्सक मौजूद है। ऐसे में डेढ़ हजार जानवरों की देखरेख करना एक चिकित्सक के लिए कितना मुश्किल है, इसका अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है। मिली जानकारी के मुताबिक वर्ष 2012 दिसम्बर से अब तक चिडिय़ाघर में 35 जानवरों की मौत हो चुकी है। इतना ही नहीं, वर्ष 2011 में एक जैब्रा ने भी दम तोड़ दिया था। जैब्रा को लकवा मार गया था और चिकित्सकों की तमाम कोशिशों के बावजूद उसे बचाया नहीं जा सका। जैब्रा देखने आने वाले लोग निराश होकर चिडिय़ाघर से वापस लौट जाते हैं और अभी तक यहां जैब्रा नहीं लाया जा सका है। बता दें कि हर साल दिल्ली सहित तमाम राज्यों के चिडिय़ाघरों में एक्सचेंज कार्यक्रम के तहत विभिन्न जानवर एक चिडिय़ाघर से दूसरे चिडिय़ाघर में भेजे जाते हैं।

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किस तरह की होती है लापरवाही

चिडिय़ाघर में एक सरकारी चिकित्सक के अलावा एक अन्य निजी चिकित्सक की भी मदद ली जाती है। गैर जिम्मेदाराना रवैये के कारण जानवर इतनी तेजी से मौत के शिकार हो रहे हैं। सूत्र बताते हैं कि तय नियम के मुताबिक किसी जानवर के बीमार होने पर उसके लक्षणों और खुराक की जानकारी बाड़े का कर्मचारी जानवर के बाड़े में रखे रजिस्टर में दर्ज कर देते हैं। इसके बाद चिकित्सक को रोजाना सभी बाड़ों का रजिस्टर पढऩा होता है और फिर जानवरों के लक्षणों की जानकारी रजिस्टर द्वारा मिलने पर बाड़े में जाकर जानवर के स्वास्थ्य की जांच करनी होती है लेकिन चिकित्सक ऐसा न कर बीमार जानवर के बाड़े के कर्मचारी को ही अपने पास बुलाकर उससे जानवर की खुराक और लक्षणों की जानकारी लेता है। कर्मचारी द्वारा जानवर की स्थिति पता लगने के बाद चिकित्सक जानवर के बाड़े में जाकर उसकी जांच करने के बजाय कर्मचारी को ही अंदाजे से दवाई जानवर को देने के लिए कह देता है। हालांकि जानवर की स्थिति बेहद गंभीर होने पर चिकित्सक बाड़े में जाकर जानवर की जांच करता है। इस मामले में जब चिडिय़ाघर के प्रवक्ता रियाज खान से बात की गई तो उन्होंने बताया कि जानवरों की बाड़े में जाकर ही चिकित्सक उनके स्वास्थ्य की जांच करते हैं। लगातार मर रहे जानवरों के मामले में प्रवक्ता ने कहा कि कुछ जानवरों की तो उम्र पूरी हो गई थी, जिसके कारण उनकी मौत हो गई।

 

As posted in Punjabkesari.in

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